@ हरि अग्रवाल
तमनार की घटना केवल एक स्थानीय कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र, पुलिस व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया पर खड़े होते गहरे सवालों का आईना है। भारी सुरक्षा घेरा, कैमरों की फ्लैशलाइट, नारेबाजी और सड़कों पर आरोपी का सार्वजनिक प्रदर्शन—यह सब किसी अपराध की जांच या गिरफ्तारी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित “पब्लिक ह्यूमिलिएशन शो” जैसा प्रतीत होता है। यह दृश्य हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम न्याय की राह पर हैं या बदले की राजनीति के रास्ते पर?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की भूमिका “संविधान के रक्षक” की होती है, न कि भीड़ की भावनाओं को शांत करने के लिए प्रतीकात्मक दंड देने वाले मंच कलाकार की। तमनार में जो हुआ, उसमें कानून की किताबें पीछे छूटती दिखीं और सड़कों पर “कबीलाई इंसाफ” का प्रदर्शन आगे आ गया। किसी आरोपी को जूतों की माला पहनाकर घुमाना, चेहरा काला करना या सार्वजनिक अपमान—ये सब मध्यकालीन दंड पद्धतियों की याद दिलाते हैं, न कि आधुनिक संवैधानिक राज्य की।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत एक महिला पुलिसकर्मी के साथ हुई हिंसा से हुई, जो निस्संदेह शर्मनाक और निंदनीय है। उस हिंसा पर कठोर कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या हिंसा का जवाब हिंसा और अपमान से दिया जा सकता है? क्या अदालतों में मुकदमा, सबूत, सुनवाई और सजा की प्रक्रिया अब अप्रासंगिक हो चुकी है? यदि आरोपी को सड़कों पर नचाकर ही “न्याय” हो जाएगा, तो फिर अदालतों, संविधान और कानून की आवश्यकता क्या रह जाती है?
यह घटना उस खतरनाक मोड़ की ओर इशारा करती है, जहां राज्य तात्कालिक लोकप्रियता और “भीड़ की तालियों” के लिए कानून के रास्ते से भटकने लगता है। भीड़ को संतुष्ट करने के लिए दिखावटी सख्ती करना आसान है, लेकिन यही रास्ता आगे चलकर अराजकता को जन्म देता है। आज यदि आरोपी को सड़कों पर अपमानित किया जा रहा है, तो कल कोई भी असहमति रखने वाला या कमजोर व्यक्ति भी इसी भीड़-न्याय का शिकार बन सकता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब कानून लागू करने वाली एजेंसियां ही कानून की सीमाएं लांघने लगें, तो अपराधी और रक्षक के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। पुलिस का काम आरोप तय करना या सजा देना नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच कर आरोपी को अदालत के सामने पेश करना है। सजा का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है। जब यह संतुलन टूटता है, तो लोकतंत्र की सांसें घुटने लगती हैं।
तमनार की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम गुस्से में “त्वरित न्याय” चाहते हैं या संवैधानिक न्याय? त्वरित न्याय दिखने में भले ही संतोष दे, लेकिन वह लंबे समय में समाज को हिंसक, असहिष्णु और कानून-विरोधी बनाता है। सच्चा न्याय वह है जो प्रक्रिया से होकर गुजरे—भले ही उसमें समय लगे।
अंततः यह घटना एक चेतावनी है। अगर आज हमने भीड़ के दबाव में कानून को ताक पर रख दिया, तो कल कानून किसी को भी नहीं बचा पाएगा। लोकतंत्र की मजबूती शोरगुल में नहीं, बल्कि उस संयम में है, जहां सबसे कठिन हालात में भी संविधान और कानून का रास्ता नहीं छोड़ा जाता।