छत्तीसगढ़जांजगीर-चांपा

दुर्घटनाओं के बाद चक्काजाम, सहानुभूति और असुविधा के बीच बढ़ता विरोधाभास

@हरि अग्रवाल

जिले में इन दिनों एक चिंताजनक प्रवृत्ति फिर से जोर पकड़ती दिख रही है। सड़क दुर्घटना या किसी हादसे में हुई मौत के बाद चक्काजाम का ट्रेंड फिर से जोर पकड़ने लगा है। हाल के महीनों में यह दृश्य बार-बार सामने आया है कि किसी हादसे के बाद आक्रोशित परिजन और समर्थक सड़क पर उतर आते हैं। यातायात रोक दिया जाता है और मांगें मनवाने के लिए दबाव बनाया जाता है। इस प्रवृत्ति ने न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी की है, बल्कि आम नागरिकों के जीवन को भी बुरी तरह प्रभावित किया है।

सड़क दुर्घटना या किसी भी हादसे में किसी की मृत्यु अत्यंत दुखद होती है। परिजनों का दर्द, उनकी पीड़ा और उनका आक्रोश स्वाभाविक है। समाज का दायित्व भी है कि वह पीड़ित परिवार के साथ खड़ा हो, उन्हें न्याय और मुआवजा दिलाने में सहयोग करे। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस पीड़ा की अभिव्यक्ति का रास्ता चक्काजाम ही होना चाहिए? क्या निर्दाेष लोगों को घंटों जाम में फंसाकर, मरीजों को अस्पताल पहुंचने से रोककर, छात्रों को स्कूल व परीक्षा केंद्र तक न पहुंचने देकर या रोज़ी-रोटी के लिए निकलने वालों को परेशान कर न्याय हासिल किया जा सकता है?

अभी हाल में जिला मुख्यालय जांजगीर के नेताजी फर्नीचर में कार्य के दौरान दुर्घटना में वहां काम करने वाले एक युवक की मौत हो गई। इसके बाद आक्रोशित परिजन व ग्रामीणों ने मुआवजे की मांग को लेकर चक्काजाम कर दिया। नेताजी चौक के पास 6 घंटा चक्काजाम के बाद सहमति बनी। इस घटना में मृत परिवारजनों के साथ लोगों की गहरी सहानुभूति थी, लेकिन चक्काजाम की वजह से कई निर्दोष लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा।

चक्काजाम का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है, जिनका दुर्घटना से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता। एम्बुलेंस फंस जाती है, स्कूल बसें रुक जाती हैं, छोटे व्यापारी नुकसान झेलते हैं और दिहाड़ी मजदूर की कमाई पर सीधा असर पड़ता है। कई बार तो जाम में फंसे लोग खुद तनाव, बीमारियों या आपात स्थितियों का सामना करते हैं। ऐसे में पीड़ा एक परिवार से निकलकर समाज के बड़े हिस्से में फैल जाती है, बिना किसी समाधान के।

कानूनी दृष्टि से भी चक्काजाम उचित नहीं ठहराया जा सकता। सड़क अवरोध सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा है और यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। पुलिस कई मामलों में कार्रवाई भी करती है, लेकिन संवेदनशीलता के कारण अक्सर शुरुआती चरण में समझाइश और संवाद का रास्ता अपनाया जाता है। यहीं समस्या जन्म लेती है। जब यह संदेश जाता है कि चक्काजाम से मांगें जल्दी पूरी होती हैं, तो यह “ट्रेंड” बन जाता है। परिणामस्वरूप हर दुर्घटना के बाद सड़क जाम को हथियार बना लिया जाता है।

इसका समाधान केवल सख्ती या केवल सहानुभूति से नहीं निकलेगा। प्रशासन को चाहिए कि दुर्घटना के मामलों में त्वरित जांच, पारदर्शी कार्रवाई और समयबद्ध मुआवजा प्रणाली सुनिश्चित करे, ताकि परिजनों को सड़क पर उतरने की नौबत ही न आए। वहीं, समाज और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि वे पीड़ित परिवारों को वैकल्पिक और वैधानिक तरीकों से अपनी बात रखने में मदद करें जैसे ज्ञापन, वार्ता, या कानूनी प्रक्रिया।  

अंततः यह समझना होगा कि सहानुभूति का अर्थ अराजकता नहीं है। पीड़ा का सम्मान जरूरी है, लेकिन निर्दाेषों को परेशान करना न्याय का रास्ता नहीं हो सकता। यदि चक्काजाम की प्रवृत्ति पर समय रहते लगाम नहीं लगी, तो यह न केवल यातायात व्यवस्था को बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर करेगी। न्याय, संवेदना और व्यवस्था तीनों का संतुलन ही इस बढ़ती समस्या का स्थायी समाधान है।

Leave a Reply