लघु कथा: बिना कुछ छोड़े कैसे बचेगा हसदेव !

बिलासपुर में लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी के समय के एक पुराने मित्र से बड़े दिनों बाद मुलाकात हुई।कुछ वर्ष पूर्व ही वह अधिकारी बना है। बिलासपुर में तैयारी के दौर से अब तक जब-जब हमारी मुलाकात होती है, तब-तब सामाजिक विषयों पर लंबी चर्चा हो जाती है।इस बार भी चर्चा आरंभ हुई।
उसने कहा, “कोरबा-हसदेव का जंगल लगभग खत्म हो गया है। तमनार, रायगढ़ की ओर भी जंगल कटाई का काम चालू हो गया है। अब अरावली पर्वत की बारी है। पूरे जल, जंगल, जमीन को खत्म करने की कवायद चल रही है।” मैंने चर्चा शुरू होते ही बात काट दी,
“अरे, ये सब छोड़ो। यह तो चलता रहता है। यह बताओ, घर में सब कैसे हैं? भाभी जी कैसी हैं? सब बढ़िया है न?”
वह मुस्कराया। “हाँ भाई, सब बढ़िया चल रहा है।” फिर कुछ रुककर उसने कहा, “रायपुर में एक नया घर बनवाना है। शहर में पापा की एक पुश्तैनी जमीन है।” मैंने पूछा,“कितनी दूर है?” “पास में ही है, चलो देख आते हैं।” उसने कहा। वह कार की ओर जैसे ही बढ़ा। मैंने कहा,
“पास में ही है तो कार से क्यों? पैदल ही चलते हैं न!” “अरे नहीं भाई, सुबह ही जिम से आया हूँ। आज मेहनत ज्यादा हो गई है।” फिर उसने अपनी SUV निकाली।हम दो लोग छह-सीटर कार में चलने लगे।मैंने कहा, “कार तो बढ़िया है, ईवी क्यों नहीं लिया?” वह बोला, “ईवी का कोई भरोसा नहीं है। और अपन सरकारी अफसर हैं, डीजल फ्री मिलता है।”
हम आगे बढ़े तो रास्ते में मैंने सहज भाव से पूछा, “तुम्हारा प्लॉट कितना बड़ा है?” “लगभग 700 स्क्वेयर फीट।”
हम प्लॉट तक पहुँचे।अच्छे लोकेशन में प्लॉट था। उसमें एक नीम और दो पीपल के बड़े पेड़ लगे थे।मैंने कहा, “लोकेशन अच्छी है। पेड़-पौधे भी हैं। घर के साथ हरियाली भी रहेगी।” वह हँस पड़ा। “अरे नहीं भाई! प्लॉट छोटा है। घर बनाना है तो पेड़ कटवाने पड़ेंगे।”
उसकी आवाज़ में कहीं भी अपराधबोध नहीं झलक रहा था।मैंने पूछा, “घर की डिज़ाइन कैसी सोच रहे हो?”
उसने उत्साह से बताया, “बस टू-बीएचके और कार की पार्किंग हो जाए। डुप्लेक्स टाइप। बाद में ऊपर किराए के लिए दो कमरे निकाल दूँगा।” मैंने धीरे से पूछा, “मतलब अच्छा-खासा सरिया और सीमेंट लगेगा। लेकिन लोहा, गिट्टी, रेत कहाँ से आएगा?” वह बोला, “दुकान से आएगा।”
मैंने कहा,“नहीं। माइनिंग से आएगा। और माइनिंग से जमीन भी जाती है, पेड़ भी।” वह कुछ क्षण चुप रहा।फिर बोला,
“भाई, सिस्टम ऐसा ही है। कोई उपाय नहीं है।” “और दरवाजे-खिड़कियाँ?” मैंने आगे पूछा। “सागौन के लगवाने हैं। घर एक बार बनता है, तो चीजें टिकाऊ होनी चाहिए।”
मैंने मुस्कराकर कहा, “सागौन भी जंगल से ही आता है।” वह बोला, “हाँ, पर अच्छा घर ऐसे ही बनता है।” मैंने आख़िरी सवाल किया, “घर बन जाएगा तब बिजली के लिए, आजकल जो सोलर सिस्टम चल रहा है, वह लगवाओगे?” वह हँसते हुए बोला, “अरे! एसी-कूलर सब लगेंगे। अधिकारी का घर है। सोलर सिस्टम लोड ले पाएगा या नहीं, क्या पता?” फिर जोड़ते हुए बोला,
“छत भी छोटी होगी। तुम्हारी भाभी को किचन गार्डन बनवाना है। सोलर पैनल के लिए जगह नहीं बचेगी।. एक-डेढ़ लाख का खर्च अलग है। हमारा छोटा परिवार है,बिजली बिल आधा हो जाता है। अपने लिए CSEB का मीटर ही ठीक है।”
तो मैंने कहा, “उस बिजली के लिए कोयला लगेगा। कोयले के लिए जंगल कटेंगे। शायद वही हसदेव…” वह चुप हो गया।उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति छा गई।फिर बोला, “भाई! तुझे वकील बनना चाहिए, कहीं की बात कहीं जोड़ देता है।”
जल, जंगल, जमीन से शुरू हुई इस पूरी बातचीत से मुझे यह समझ आया कि हम जंगल बचाने की बात तब तक ही करते हैं, जब तक वह हमारे घर, खेत और सुख-सुविधाओं के रास्ते में न आए।आज हमने अपनी जरूरतें इतनी बढ़ा ली हैं कि पीछे एक सामान्य जीवन शैली में लौटना कठिन होता जा रहा है।
हम अपनी जीवनशैली से एक भी सुविधा कम नहीं करना चाहते।गर्मी में एसी के बिना बातचीत तक नहीं हो पाती। पंखा तो छोड़िए, कूलर से भी अब संतोष नहीं मिलता। और फिर, एसी- फ्रिज छोड़ने की ही बात भला कौन करें?सोशल मीडिया पर #save_hasdeo चलाने वाले, दिन में दो-दो बार मोबाइल चार्ज करने वाले युवाओं तक की बिजली भी हसदेव जैसे जंगलों को काटकर ही पहुँच रही है।पर हमें क्या? हमारी सुविधाओं की कीमत पर प्रकृति को हो रहा नुकसान हमारे लिए महत्वहीन हो चुका है।जैसे ही हम “आवश्यकता” और “सुविधा” के बीच खड़े होते हैं,हम एक ही वाक्य बोल देते हैं,
“ऐसा ही चलता है, कोई उपाय नहीं है।”और यही कहकर हम अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।सच बात तो यह है कि उपाय हमेशा होते हैं।बस उन्हें अपनाने के लिए हमें अपनी आदतें बदलनी पड़ती हैं।और वही बदलाव हमें सबसे कठिन लगता है।जल, जंगल और जमीन बचाने की बात सब करते हैं,लेकिन अपनी सुविधाओं को कम करने की बात कोई नहीं करता।
लेख: वेद प्रकाश सिंह, रिसर्च स्कॉलर कलिंगा विश्वविद्यालय रायपुर