✨ राम को मानें या राम की मानें?

आधुनिक युग में हर वर्ष रावण का दहन किया जाता है। परंतु सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि — क्या हम सच में रावण को जला रहे हैं, या केवल उसके पुतले को?
और इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि — हम राम को मानते हैं या राम की मानते हैं?
हर युग में यह प्रश्न पुनः खड़ा होता है — क्या केवल राम के नाम का उच्चारण ही हमें रामराज्य तक ले जा सकता है?
क्या केवल राम के गुणगान करने से ही हम उनके आदर्शों को अपना पाएंगे?
नहीं।

रामराज्य तभी संभव है जब हम राम की मानें — अर्थात उनके चरित्र, आचरण और जीवन के सिद्धांतों को अपने व्यवहार में उतारें।
राम का जीवन केवल एक कथा नहीं, बल्कि आदर्शों का ऐसा मार्ग है, जो मानवता को सत्य, मर्यादा और धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा देता है।
केवल राम को मानना यानी श्रद्धा का प्रदर्शन है,
परंतु राम की मानना यानी उस श्रद्धा को कर्म में रूपांतरित करना है।
दुर्भाग्यवश आज का समाज इन मूल्यों से दूर होता जा रहा है।
हम महान पुरुषों का स्मरण तो करते हैं, पर उनके आदर्शों को अपने जीवन में स्थान नहीं देते।
उनकी जीवनी पर चर्चा करते हैं, पर उनके गुणों को अपनाने का प्रयास नहीं करते।
आज का युग केवल “मानने” तक सीमित रह गया है — “मानने” का अर्थ समझने और जीने से बहुत अलग है।
रामराज्य केवल तब आएगा, जब हर व्यक्ति के भीतर राम के आदर्श जीवित होंगे —
जब सत्य बोलना, न्याय करना और करुणा रखना हमारे आचरण का हिस्सा बनेगा।
राम की मर्यादा केवल ग्रंथों में नहीं, हमारे जीवन में झलकेगी —
तभी सच्चे अर्थों में रामराज्य का पुनर्जागरण होगा।
अतः समय की पुकार है —
अब केवल राम को मत मानो,
बल्कि राम की मानो।
✍️ लेखक — नीलम सोनार
प्रदेश संगठन महामंत्री, अंतरराष्ट्रीय हिन्दू महासभा, छत्तीसगढ़ प्रदेश