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जब जेल भी वीआईपी बन जाए: कानून, नेता और आम आदमी के बीच टूटती समानता

@ हरि अग्रवाल

भारतीय संविधान ने देश के हर नागरिक को समानता, न्याय और गरिमा के साथ जीने का अधिकार दिया है। कानून की नजर में अमीर–गरीब, ताकतवर–कमजोर, नेता–नागरिक सभी बराबर हैं। लेकिन जब हम हकीकत की जमीन पर उतरकर देखते हैं, तो यह समानता कई बार सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आती है। खासकर छत्तीसगढ़ में इन दिनों जो “जेल की राजनीति” देखने को मिल रही है, उसने इस सवाल को और गहरा कर दिया है कि क्या वाकई कानून सबके लिए एक समान है?

कुछ प्रकरणों में एक दृश्य समान रूप से सामने आया। जेल के बाहर समर्थकों की भीड़, नेताओं के स्वागत में नारे, और फिर एक साथ कई लोगों का जेल के भीतर जाकर मुलाकात करना। यह दृश्य आम जनता के मन में कई सवाल खड़े करता है। क्या जेल के नियम नेताओं के लिए अलग हैं? क्या कानून की सख्ती सिर्फ आम आदमी तक ही सीमित है?

जेल प्रशासन के नियम साफ कहते हैं कि मुलाकात की एक तय प्रक्रिया होती है। आम आदमी जब किसी मामले में जेल जाता है, तो उसके परिजन घंटों इंतजार करते हैं। कई बार उन्हें केवल मुख्य द्वार तक ही सीमित रखा जाता है। बंदी को बाहर लाकर कुछ मिनट की बातचीत कराई जाती है, वह भी कड़ी निगरानी में। मां की आंखों में आंसू होते हैं, पत्नी हाथ जोड़कर विनती करती है, बच्चे अपने पिता को दूर से देखकर लौट जाते हैं। वहां न कोई नारा होता है, न कोई सिफारिश, न कोई “विशेष व्यवस्था”।

लेकिन जब कोई प्रभावशाली नेता जेल जाता है, तो वही नियम अचानक लचीले हो जाते हैं। जेल के दरवाजे खुलते हैं, समर्थकों का आना-जाना बढ़ जाता है, और मुलाकात एक सामान्य प्रक्रिया नहीं बल्कि शक्ति-प्रदर्शन का रूप ले लेती है। यही वह क्षण है, जब आम नागरिक का भरोसा व्यवस्था से डगमगाने लगता है। उसे लगता है कि न्याय का तराजू अब बराबरी पर नहीं टिका, बल्कि वजन और रसूख के अनुसार झुकता है।

यह सवाल सिर्फ जेल प्रशासन या पुलिस व्यवस्था का नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब कानून सबके लिए एक जैसा हो। अगर जेल के भीतर भी वीआईपी संस्कृति पनपने लगे, तो आम आदमी के मन में यह भावना गहरी होती जाती है कि उसके लिए न्याय पाना हमेशा कठिन रहेगा।

दर्द की बात यह है कि आम व्यक्ति जब कानून के शिकंजे में आता है, तो उसके पास न भीड़ होती है, न आवाज़। वह सिस्टम के सामने अकेला खड़ा होता है। वहीं नेता जेल जाकर भी अकेला नहीं होता—उसके साथ उसकी राजनीतिक ताकत, समर्थकों की संख्या और सत्ता की परछाईं रहती है।

यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ है, जो कानून को दो हिस्सों में बांट देती है—एक खास लोगों के लिए, दूसरा आम जनता के लिए। अगर हमें सच में संविधान की भावना को जीवित रखना है, तो जेल हो या सड़क, अदालत हो या प्रशासन—हर जगह एक ही नियम, एक ही व्यवहार और एक ही न्याय दिखना चाहिए।

वरना लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज यही होगी कि आम आदमी यह मान ले कि कानून उसका नहीं, सिर्फ ताकतवरों का हथियार है। यही विश्वास का टूटना, किसी भी व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

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