छत्तीसगढ़राजनीति

अपराध, राजनीति और भावनाओं के बीच उलझती न्यायिक व्यवस्था

@ हरि अग्रवाल

जैजैपुर विधायक बालेश्वर साहू की गिरफ्तारी और जेल जाने के बाद प्रदेश की राजनीति मे जिस तरह उबाल देखा गया , वह केवल एक व्यक्ति या एक मामले तक सीमित नहीं रही। यह घटना छत्तीसगढ़ की सियासत, न्याय व्यवस्था और जनभावनाओं के टकराव के कारण आरोप पर राजनीतिक अखाड़े का प्रतीक बन गई।

भले ही यह कार्रवाई न्यायालय के आदेश पर हुई हो, लेकिन राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं ने इस घटनाक्रम को एक न्यायिक प्रक्रिया से ऊपर एक राजनीतिक दाव पेच का विषय बना दिया है, जिसके कारण न्यायालय के निर्णयो की संवैधानिक व्यवस्था ही दरकिनार होते दिखाई दे रही है।

कांग्रेस ने इस कार्रवाई को बदले की राजनीति करार दिया। पार्टी का तर्क था कि मामला विधायक बनने से पहले का है और अब अचानक कार्रवाई कर सरकार आलोचक आवाज़ को दबाना चाहती है। इसी भावना के साथ पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत सहित कांग्रेस के कई नेता जिला जेल पहुंचे। वहां की तस्वीरें और बयान भावनाओं से भरे थे। एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि के साथ खड़े होने का संदेश, और यह दावा कि लोकतंत्र में असहमति की कीमत जेल नहीं होनी चाहिए।

वहीं दूसरी ओर भाजपा का रुख भी उतना ही तीखा था। भाजपा ने इसे कानून का सामान्य और जरूरी कदम बताते हुए कहा कि धोखाधड़ी के मामले में आरोपी को आरोपी ही कहा जाएगा, चाहे वह विधायक हो या आम नागरिक। पार्टी ने प्रेसवार्ता कर कांग्रेस नेतृत्व से सवाल पूछा “क्या आप किसान के साथ हैं या उस व्यक्ति के साथ, जिस पर किसान से धोखाधड़ी का आरोप है?”

इस पूरे घटनाक्रम में आम जनता असमंजस में दिखी। एक ओर संवैधानिक सिद्धांत कहता है कि कानून सबके लिए समान है और न्यायालय के आदेश सर्वाेपरि हैं। दूसरी ओर राजनीति की भाषा और भावनात्मक बयान लोगों के मन में यह शंका पैदा करते हैं कि कहीं कानून का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार तो नहीं बन रहा। यही शंका लोकतंत्र के लिए सबसे संवेदनशील बिंदु होती है।

जब न्यायालय से बालेश्वर साहू को जमानत मिली और उनकी रिहाई हुई, तो कांग्रेस ने जुलूस निकालकर इसे राजनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत किया। समर्थकों के लिए यह राहत और भावनात्मक पल था। उनका नेता वापस आया था। लेकिन भाजपा ने इस पर सवाल उठाया और कहा कि जमानत को विजय की तरह पेश करना कहा तक उचित है, क्योंकि न्यायालय ने अभी अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।

इस पूरे प्रकरण से एक कड़वी सच्चाई सामने आती है, हम अक्सर न्याय को फैसले से पहले ही राजनीति के चश्मे से देखने लगते हैं। नेता जेल जाए तो वह शहीद, और विरोधी जाए तो अपराधी। यह सोच लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर करती है। न्याय को न तो राजनीतिक बदले का औजार बनना चाहिए और न ही भावनात्मक भीड़तंत्र का शिकार।

अंततः यह मामला हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र का आधार संयम है। संयम सत्ता का, संयम विपक्ष का और संयम जनता का। न्यायालय को अपना काम करने देना, राजनीति को अपनी सीमाएं समझना और भावनाओं को विवेक के साथ साधना, यही संतुलन इस तरह के मामलों में लोकतंत्र को मजबूत रख सकता है। क्योंकि जब न्याय, राजनीति और भावनाएं एक-दूसरे में उलझ जाती हैं, तब सबसे ज्यादा नुकसान विश्वास का होता है और विश्वास टूटे तो लोकतंत्र कमजोर पड़ता है।

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