देश- विदेशराजनीति

भारत की वर्तमान दशा, लोकतांत्रिक भ्रम और क्रांति की आवश्यकता: जस्टिस मार्कंडेय काटजू का विचार आखिर कितना प्रासंगिक!

हरि अग्रवाल@सच का आईना

भारत के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू हमेशा अपने बेबाक, स्पष्ट और अक्सर विवादास्पद विचारों के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने भारत की वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का जो विश्लेषण किया है, वह बेहद चिंताजनक है। उनका स्पष्ट मानना है कि देश की सभी प्रमुख संस्थाएं, चाहे वह संसद हो, न्यायपालिका हो या नौकरशाही पूरी तरह से ढह चुकी हैं और अंदर से खोखली हो गई हैं। उनके अनुसार, मौजूदा लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचा अब देश की समस्याओं को हल करने में पूरी तरह अक्षम है।

आर्थिक और सामाजिक संकट की जमीनी हकीकत 

जस्टिस काटजू के अनुसार, भारत एक गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। हर साल लगभग 1.2 करोड़ युवा नौकरी की तलाश में जॉब मार्केट में आते हैं, लेकिन संगठित अर्थव्यवस्था में मुश्किल से 5 लाख नौकरियां ही उपलब्ध हैं। रोजगार का आलम यह है कि एक सामान्य चपरासी की नौकरी के लिए पीएचडी धारक और इंजीनियर तक आवेदन कर रहे हैं। नौकरियां न मिलने के कारण युवा सड़कों पर हॉकर, बाउंसर, भिखारी या अपराधी बनने को मजबूर हैं।

देश में भुखमरी और कुपोषण की स्थिति भयावह है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 125 देशों में 107वें स्थान पर खिसक गया है। देश का हर दूसरा बच्चा कुपोषित है और 57% महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) की शिकार हैं। महंगाई आसमान छू रही है और स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाएं इतनी महंगी हो गई हैं कि आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। गरीब लोगों को बड़े अस्पतालों के बजाय ‘झोलाछाप’ डॉक्टरों पर निर्भर रहना पड़ता है। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है।

लोकतंत्र एक भ्रम और मतदाताओं पर प्रहार 

जस्टिस काटजू भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप के सख्त खिलाफ हैं। उनका मानना है कि भारत में लोकतंत्र सामंती शक्तियों, जातिवाद और सांप्रदायिकता को और मजबूत कर रहा है। वे स्पष्ट कहते हैं कि 90% भारतीय मतदाता “बेवकूफ” हैं क्योंकि वे उम्मीदवार की योग्यता  नहीं देखते, बल्कि केवल अपनी जाति और मजहब के आधार पर वोट डालते हैं।

उनका तर्क है कि लोकतंत्र का वास्तविक उद्देश्य लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना है, लेकिन भारत का लोकतंत्र देश को गरीब और पिछड़ा ही बनाए रखता है। वे चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि जो जनता जाति-बिरादरी के आधार पर “भेड़-बकरियों” की तरह वोट डालती है, उसे वोट देने का अधिकार ही नहीं होना चाहिए।

राजनेताओं की अवसरवादिता और ‘इलेक्शन मोड’

देश के राजनेताओं के प्रति उनका नज़रिया बेहद तीखा है। उनका कहना है कि सभी पार्टियों के राजनेता “दो कौड़ी के लोग” हैं, जिनका देश से कोई वास्तविक प्रेम नहीं है; उन्हें केवल सत्ता और पैसे से मतलब है। चुनाव जीतने के लिए ये नेता समाज में नफरत फैलाते हैं और लोगों को जाति-धर्म के नाम पर बांटते हैं। 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों के कारण देश हमेशा ‘इलेक्शन मोड’ में रहता है। वे चीन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि चीन में चुनाव नहीं होते, इसलिए वहां का पूरा ध्यान आर्थिक विकास पर है (उनकी जीडीपी 30 ट्रिलियन डॉलर है), जबकि भारत में राजनेताओं का ध्यान केवल राम मंदिर जैसे मुद्दों और अगले चुनाव जीतने पर केंद्रित रहता है।

संविधान और अधिकारों का खोखलापन 

जस्टिस काटजू भारत के संविधान को “जनता को बेवकूफ बनाने का जरिया” मानते हैं। संविधान में भले ही लिखा हो कि जनता राजा है और उसे अभिव्यक्ति, समानता और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन हकीकत में एक गरीब, बेरोजगार और भूखे व्यक्ति के लिए इन अधिकारों का कोई अर्थ नहीं है। उनका तर्क है कि “गरीबी सभी अधिकारों का हनन कर देती है,” इसलिए संविधान केवल लोगों को यह भ्रम देने के लिए है कि वे राजा हैं ताकि वे अपने खिलाफ हो रहे अन्याय पर विद्रोह न करें।

जातिवाद

शिक्षित वर्ग में भी व्याप्त जातिवाद को लेकर वे केवल राजनेताओं को ही नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे वर्ग को भी आईना दिखाते हैं। देहरादून यूनिवर्सिटी का एक किस्सा साझा करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे अमेरिका और लंदन से पीएचडी करके आए प्रोफेसर भी अपनी बेटी की शादी किसी दलित से करने को तैयार नहीं होंगे। उन्होंने इसे यह कहकर सिद्ध किया कि इन शिक्षित लोगों के “खोपड़े में भी जातिवाद का गोबर भरा हुआ है”। आरक्षण को वे अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का हिस्सा और एक ‘राजनीतिक स्टंट’ मानते हैं, जो दलितों को बैसाखी थमाकर उन्हें भ्रम में रखता है। इसी संदर्भ में उन्होंने बीआर अंबेडकर को ब्रिटिश नीति का एजेंट और एक जातिवादी नेता करार दिया।

न्यायपालिका का पतन और ‘कैरियरिस्ट’ 

जज न्यायपालिका का हिस्सा रह चुके जस्टिस काटजू मानते हैं कि यह संस्था भी पूरी तरह से भ्रष्टाचार और लेटलतीफी का शिकार हो चुकी है। आज 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। जजों पर काम का इतना बोझ है (जैसे एक इंसान पर हाथी लाद दिया गया हो) कि एक मामले में 20-25 साल लग जाते हैं। पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण के एक हलफनामे का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 16 पूर्व मुख्य न्यायाधीशों में से कम से कम 8 भ्रष्ट थे।

वे जजों के कोर्ट में अत्यधिक बोलने की आदत की भी कड़ी आलोचना करते हैं। उनका मानना है कि जजों को केवल अपने फैसलों के माध्यम से बोलना चाहिए, न कि कोर्ट में बैठकर अनावश्यक टिप्पणियां या उपदेश देने चाहिए।

उन्होंने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें एक “कैरियरिस्ट” व्यक्ति बताया, जिनका एकमात्र उद्देश्य किसी भी कीमत पर CJI बनना था। काटजू के अनुसार, चंद्रचूड़ ने अयोध्या और ज्ञानवापी मामलों में अपनी कुर्सी बचाने और सत्ता को खुश करने के लिए विवादास्पद फैसले दिए। इसके विपरीत, उन्होंने इमरजेंसी के दौरान साहसिक फैसला देने वाले जस्टिस एच.आर. खन्ना की प्रशंसा की, जिन्होंने अपनी पदोन्नति की परवाह किए बिना न्याय का साथ दिया।

अवमानना के मुद्दे पर उनका साफ मानना है कि यदि कोई उन्हें चोर या बेवकूफ कहता है तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता। वे अवमानना का मुकदमा तभी चलाएंगे जब कोई उनके काम में बाधा डाले।

एकमात्र समाधान

एक महान जन संघर्ष (क्रांति) अंततः जस्टिस काटजू का स्पष्ट मानना है कि व्यवस्था में छोटे-मोटे सुधारों या चुनाव के माध्यम से नेतृत्व परिवर्तन (जैसे नीतीश कुमार की जगह तेजस्वी यादव का आना) से आम आदमी के जीवन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा; “जनता दासी की दासी रहेगी”।

देश की समस्याओं का एकमात्र समाधान एक “महान जन संघर्ष” (क्रांति) है, जो जातिवाद और सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर लड़ा जाएगा। यह संघर्ष 10 से 20 साल तक चलेगा और इसमें भारी कुर्बानियां देनी होंगी। उनका मानना है कि जब देश पर बड़ा ऐतिहासिक संकट आएगा, तब प्रकृति स्वयं आधुनिक और वैज्ञानिक सोच वाले नए नेताओं को जन्म देगी—ठीक वैसे ही जैसे इंग्लैंड में क्रॉमवेल, अमेरिका में वाशिंगटन और फ्रांस में रोबेस्पियर आए थे। केवल यही आधुनिक सोच वाले नेता तेजी से औद्योगीकरण करके देश को एक नई व्यवस्था और बेहतर जिंदगी दे सकते हैं।

जस्टिस मार्कंडेय काटजू के विचार भले ही अत्यधिक कड़वे, विवादास्पद और निराशावादी प्रतीत हों, लेकिन वे भारतीय व्यवस्था की उन दुखती रगों पर हाथ रखते हैं जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। उनका यह बेबाक विश्लेषण भारतीय लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं और समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि यदि बेरोजगारी, गरीबी और जातिवाद जैसी मूल समस्याओं का वास्तविक समाधान नहीं हुआ, तो यह देश एक बड़ी और अपरिहार्य क्रांति की ओर अग्रसर होगा।

Leave a Reply