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विरोध की राजनीति और सत्ता का दोहरा चरित्र: जब आंदोलन की कोख से जन्मी पार्टी ही विरोध को ‘अराजकता’ बताने लगे

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन, सत्याग्रह और जन-आंदोलन कभी अपराध नहीं, बल्कि शासन को जवाबदेह बनाए रखने के सबसे सशक्त माध्यम रहे हैं। विडंबना यह है कि आज जब सीजेपी, विपक्ष चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के आचरण, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर सड़क पर है, तो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इसे लोकतंत्र का तकाजा मानने के बजाय ‘अराजकता’, ‘देश विरोधी साजिश’ और ‘देश की छवि को धूमिल करने का प्रयास’ करार देती है। सरकार की ओर से ऐसे आंदोलनों को बिना जनादेश के सत्ता परिवर्तन की कोशिश बताया जाता है और विरोध की हर आवाज को जॉर्ज सोरोस, विदेशी ताकतों अथवा पाकिस्तानी आईएसआई (ISI) के टूलकिट से जोड़ने की पटकथा दोहराई जाने लगती है। 

सत्ता के शीर्ष पर बैठकर विरोध प्रदर्शनों को देश की प्रगति में रोड़ा बताना और ‘इमरजेंसी जैसे हालात’ पैदा कर देना उस पार्टी को शोभा नहीं देता जिसकी पूरी राजनीतिक नींव ही आंदोलनों, अवज्ञा और बिना अनुमति के किए गए धरनों पर टिकी हुई है। यदि इतिहास के पन्नों को निष्पक्षता से पलटा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जिसे आज सत्ता ‘अराजकता’ कह रही है, कभी बीजेपी उसी रास्ते पर चलकर सत्ता के शिखर तक पहुंची थी।

 बीजेपी के वैचारिक मातृ-संगठन और जनसंघ के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि इसका अस्तित्व ही व्यवस्था को खुली चुनौती देकर गढ़ा गया था।  बीजेपी के वैचारिक संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री थे, जिन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के विरोध में मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर अक्टूबर 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। जम्मू-कश्मीर को दिए गए विशेष दर्जे के खिलाफ उन्होंने 11 मई 1953 को बिना किसी सरकारी परमिट या अनुमति के लखनपुर सीमा से कश्मीर में प्रवेश किया। 

उन्होंने “एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे” का ऐतिहासिक नारा दिया और सरकारी नियमों को जानबूझकर तोड़ा। सरकार ने उन्हें बिना अनुमति प्रवेश के आरोप में गिरफ्तार कर डिटेंशन में डाला, जहाँ रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। बाद में इसी आंदोलन के दबाव में परमिट व्यवस्था समाप्त हुई और आज भी बीजेपी हर वर्ष 23 जून को ‘बलिदान दिवस’ के रूप में मनाती है। यदि आज की सत्ता की परिभाषा लागू की जाए, तो क्या उनके इस सविनय अवज्ञा आंदोलन को अराजकता कहा जा सकता है?

वर्ष 1973 में जब पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े, तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए खुद बैलगाड़ी पर बैठकर संसद भवन पहुंचे थे। हालांकि तब तेल की कीमतें पश्चिम एशिया के संकट के कारण बढ़ रही थीं, फिर भी विपक्ष के उस नाटकीय विरोध को किसी ने ‘विदेशी ताकतों की साजिश’ करार नहीं दिया था।

गुजरात में छात्रों द्वारा हॉस्टल की मेस फीस वृद्धि से शुरू हुआ नवनिर्माण आंदोलन इतना व्यापक हुआ कि इसने चिमनभाई पटेल की तत्कालीन कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इस आंदोलन का सक्रिय हिस्सा रहे थे और वे कई बार स्वीकार कर चुके हैं कि इसी जन-आंदोलन से उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत हुई थी।

25 जून 1975 की रात इमरजेंसी की घोषणा के बाद जब पुलिस अरुण जेटली को गिरफ्तार करने पहुंची, तो वे बच निकले। अगली सुबह 26 जून को दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) के तत्कालीन अध्यक्ष अरुण जेटली ने वाइस चांसलर के कार्यालय के बाहर छात्रों को एकजुट किया, इंदिरा गांधी का पुतला फूंका और भाषण दिया। इसके बाद उन्हें मीसा (MISA) के तहत गिरफ्तार किया गया और वे करीब 19 महीने अंबाला तथा तिहाड़ जेल में रहे। जेटली ने बाद में गर्व से लिखा था कि उन्हें आपातकाल के खिलाफ देश का पहला विरोध आयोजित करने का सौभाग्य मिला था और उन्होंने इसे ‘पहला सत्याग्रह’कहा था। आपातकाल के दौरान नरेंद्र मोदी ने भूमिगत रहकर युवाओं के नाम गुप्त संदेश जारी किए थे कि वे लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरें। उस समय किसी भी सत्ताधारी एजेंसी ने उनसे पुलिस अनुमति लाने की शर्त नहीं रखी थी।

21 दिसंबर 1992 को लोकसभा में मदन लाल खुराना ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था कि वाजपेयी जी दिल्ली में अनशन पर बैठे हैं, पूरे शहर में धारा 144 लगाकर लोकतंत्र की हत्या की जा रही है और इनडोर स्टेडियम तक में प्रदर्शन की अनुमति रद्द की जा रही है। इसके बाद 25 फरवरी 1993 को बीजेपी ने ऐतिहासिक बोट क्लब पर महारैली का ऐलान किया। सरकार ने रैली पर प्रतिबंध लगाया, पूरी नई दिल्ली को छावनी में बदल दिया और लालकृष्ण आडवाणी तथा अटल बिहारी वाजपेयी सहित शीर्ष नेताओं को हिरासत में ले लिया। उस दिन करीब 25,000 बीजेपी कार्यकर्ताओं को बसों में भरकर विभिन्न स्टेडियमों में अस्थायी जेलों में बंद किया गया था। उस समय बीजेपी ने इन पाबंदियों को ‘लोकतंत्र का गला घोंटना’ बताया था। इसी टकराव के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शन हमेशा के लिए प्रतिबंधित कर जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल बनाया गया था—वही जंतर-मंतर जिसे हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिश पर डी-नोटिफाई कर दिया गया है।

वर्ष 2006 में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के आह्वान पर ईंधन मूल्य वृद्धि के खिलाफ देशव्यापी ‘रास्ता रोको’ किया गया। अहमदाबाद के कालूपुर रेलवे स्टेशन पर गुजरात बीजेपी अध्यक्ष वजुभाई वाला के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने पटरियों पर बैठकर रेल यातायात पूरी तरह ठप कर दिया था। फरवरी 2010 में नितिन गडकरी सब्जियों की माला पहनकर जंतर-मंतर पहुंचे थे। इसके बाद 21 अप्रैल 2010 को बीजेपी की ‘महंगाई विरोधी महारैली’ में लाखों कार्यकर्ताओं ने पूरी राष्ट्रीय राजधानी को बंधक बना लिया था। आडवाणी, सुषमा स्वराज और गडकरी ट्रकों पर सवार होकर संसद घेरने निकले थे, जहां भीषण गर्मी के कारण गडकरी बेहोश भी हो गए थे। बाबा रामदेव के रामलीला मैदान धरने पर मध्यरात्रि की पुलिस कार्रवाई को बीजेपी ने ‘अघोषित आपातकाल’ करार दिया था। इसके विरोध में राजघाट पर बापू की समाधि के पास 24 घंटे का उपवास रखा गया, जहां रात दो बजे तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और बीजेवाईएम अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने ‘यह देश है वीर जवानों का’ गीत पर नृत्य किया था। विरोध जताने पर सुषमा स्वराज ने इसे राष्ट्रभक्ति का उत्साह बताते हुए पूरी तरह जायज ठहराया था।

कोयला घोटाले (कोलगेट) के समय 2012 के मानसून सत्र में बीजेपी ने 20 में से 13 कार्यदिवस संसद को पूरी तरह ठप कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा इसे संसदीय व्यवस्था का अपमान बताने पर सुषमा स्वराज ने प्रसिद्ध बयान दिया था कि “संसद को न चलने देना भी लोकतंत्र की एक प्रभावी विधा है”। उसी वर्ष अरुण जेटली ने भी एक लेख में तर्क दिया था कि अगर सत्ता पक्ष बहस का उपयोग जवाबदेही से बचने के लिए करता है, तो सदन की कार्यवाही रोकना विपक्ष का वैध लोकतांत्रिक हथियार है। 31 मई 2012 को देशव्यापी भारत बंद के बाद 17 जून 2012 से बीजेपी ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘जेल भरो आंदोलन’ शुरू किया। वर्ष 2013 में रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी के आवास के बाहर प्रदर्शन करते हुए अनुराग ठाकुर ने खुलेआम ऐलान किया था कि “हम संसद से सड़क तक लड़ेंगे और इस सरकार को उखाड़ फेंकेंगे”।

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले में छात्र समाज के ‘नबान्न अभियान’ के बाद बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 12 घंटे का बंद बुलाया। बीजेपी सांसद जगन्नाथ सरकार ने शांतिपुर में रेलवे ट्रैक जाम किया और पूर्व रेलवे के अनुसार राज्य भर में करीब 50 स्थानों पर ट्रेन पटरियां रोकी गईं। तब ममता बनर्जी सरकार की पुलिसिया सख्ती पर बीजेपी प्रवक्ताओं ने सवाल दागा था कि “क्या न्याय मांगने वाले छात्र टैंक लेकर चल रहे हैं जो उन पर ऐसी बर्बरता की जा रही है?” वही पार्टी जब केंद्र की सत्ता में दिल्ली में बैठती है, तो छात्र, युवा या विपक्षी दलों के मार्च को रोकने के लिए रातों-रात 12,000 अर्धसैनिक बल तैनात कर देती है। वहां अनुमति न होने, ट्रैफिक व्यवधान और कानून-व्यवस्था का बहाना बनाकर संवैधानिक अधिकारों को कुचल दिया जाता है।

संवैधानिक अधिकार, ‘इमरजेंसी 2.0’ और लोकतंत्र का क्षरण

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्र होने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। यद्यपि लोक-व्यवस्था के तहत युक्तियुक्त प्रतिबंध मान्य हैं, लेकिन वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) मामले में स्पष्ट फैसला दिया था कि जंतर-मंतर या बोट क्लब जैसे स्थलों पर प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता और नागरिकों के विरोध करने के अधिकार तथा स्थानीय निवासियों की सुविधा के बीच संतुलन होना चाहिए।

आज स्थिति यह बना दी गई है कि जो नागरिक या राजनीतिक दल सरकार के निर्णयों पर सवाल उठाता है, उसे सीधे तौर पर राष्ट्र की प्रगति का विरोधी या विदेशी टूलकिट का मोहरा घोषित कर दिया जाता है। पुलिस लाउडस्पीकरों से संघर्ष करने पर पाबंदी के फरमान सुनाती है। यह दमनकारी रवैया और प्रदर्शनों पर अघोषित निषेध साफ दर्शाता है कि देश व्यावहारिक तौर पर इमरजेंसी 2.0′ के साये में प्रवेश कर चुका है। वैश्विक समाचार एजेंसियां जब इन दमनकारी दृश्यों को दुनिया के 170 देशों में प्रसारित करती हैं, तो भारत के लोकतंत्र की साख को सबसे गहरा आघात पहुंचता है।

निष्कर्ष

सत्ता का यह तर्क कि “प्रदर्शनों से अराजकता फैलती है और देश 2047 के विकास लक्ष्य से भटक जाएगा”, दरअसल असहमति को दबाने का एक राजनीतिक मुखौटा मात्र है। किसी भी लोकतंत्र में जनता और विपक्ष को यह हक होता है कि वह संवैधानिक सीमाओं में रहकर सरकार को कठघरे में खड़ा करे। जिस पार्टी का समूचा अस्तित्व डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के परमिट उल्लंघन, जेपी आंदोलन के छात्र विद्रोह, आपातकाल के सत्याग्रह और यूपीए दौर के चक्काजाम व संसद गतिरोधों से सींचा गया हो, उसका आज विरोध को देशद्रोह और अराजकता बताना इतिहास का सबसे बड़ा अंतर्विरोध है। सत्ता के मद में अपनी ही जड़ों को भुलाकर लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलना न केवल जनता के विश्वास के साथ छल है, बल्कि यह भूलना भी है कि इतिहास में जब-जब दमन का सहारा लिया गया, जन-आंदोलनों ने बड़े-से-बड़े तख्तों को पलट दिया 

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