छत्तीसगढ़जांजगीर-चांपा

विद्यालय केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ाने का स्थान नहीं, बल्कि बच्चों के जीवन निर्माण की प्रयोगशाला है

जांजगीर चांपा। विद्यालय केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ाने का स्थान नहीं, बल्कि बच्चों के जीवन-निर्माण की प्रयोगशाला है। यहाँ ज्ञान, अनुशासन, संस्कार और आत्मविश्वास का बीजारोपण होता है। इस प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए विद्यालय और परिवार का सामंजस्य आवश्यक है। इसी उद्देश्य से आजकल स्कूलों में पालक-शिक्षक बैठक (Parent-Teacher Meeting) को अनिवार्य कर दिया गया है। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विद्यार्थी के उज्ज्वल भविष्य का पथ-प्रदर्शक है।

एक बच्चा तीन स्थानों से शिक्षा पाता है घर से, स्कूल से और समाज से। शिक्षा का असली उद्देश्य केवल डिग्री पाना नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देना है। अभिभावक और शिक्षक जब एक स्वर में बोलते हैं, तभी विद्यार्थी का भविष्य सफल होता है।
पालक की महत्वपूर्ण भूमिका-

पालक का अर्थ है बच्चे का पालन-पोषण करने वाला और उसे सही दिशा में आगे बढ़ाने वाला। विकास में सहयोग: बच्चे को संस्कारी और सर्वगुण सम्पन्न बनाने में प्रेरणा दें। सकारात्मक वातावरण: घर का माहौल पढ़ाई और आत्म-विकास के लिए अनुकूल बनाएं। समय देना: बच्चों से आत्मीय संवाद कर उनकी भावनाओं को समझें। जिम्मेदारी: आत्मविश्वास, एकाग्रता और निर्णय क्षमता विकसित करना पालक की जिम्मेदारी है।

विद्यार्थी की भूमिका-

खुला संवाद: शिक्षकों और पालकों से अपनी समस्याएँ व अनुभव साझा करें। सक्रिय भागीदारी: कक्षा और अन्य गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग लें। तनावमुक्त अध्ययन: शिक्षकों और पालकों के सहयोग से तनाव को दूर रखें और अपनी क्षमता का श्रेष्ठ प्रदर्शन करें। पालक शिक्षक बैठक से छात्रों को मिलने वाला लाभ – पालक-शिक्षक बैठक के माध्यम से शिक्षकों को बच्चों की प्रगति और समस्याओं का सही आकलन मिलता है। पालकों को बच्चों की शैक्षणिक उपलब्धियों और सुधार की दिशा का ज्ञान होता है। विद्यार्थियों को घर और विद्यालय दोनों से समान मार्गदर्शन व सहयोग मिलता है। शिक्षा के साथ-साथ संस्कार और जीवन-मूल्य का विकास सुनिश्चित होता है।

अतः हम कह सकते हैं कि पालक-शिक्षक बैठक केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि विद्यालय, परिवार और समाज के बीच मजबूत सेतु है। जब शिक्षक और पालक मिलकर बच्चे के भविष्य की नींव रखते हैं, तब वह विद्यार्थी न केवल विद्वान बनता है, बल्कि जिम्मेदार नागरिक भी बनता है। अतः हर पालक का यह कर्तव्य है कि वह इस बैठक में अनिवार्य रूप से भाग ले और बच्चों की सफलता का साझेदार बने।

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