जनता को भाषण नहीं, बिजली चाहिए, चांपा में कई सालों से बरकरार है बिजली की गंभीर समस्या

जांजगीर चांपा। 45 डिग्री की भीषण गर्मी में घंटों बिजली गुल रहने से परेशान चांपा शहर की जनता का गुस्सा अब खुलकर सामने आने लगा है। ऊपर से विद्युत विभाग की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने लोगों के जले पर नमक छिड़कने का काम कर दिया। विभाग ने बिजली कटौती पर सवाल उठाने वालों को आक्रोशित होने के बजाय “मानवता” और “देशभक्ति” दिखाने की नसीहत दे डाली।
पोस्ट में कहा गया कि मशीन और इंसान दोनों की काम करने की एक क्षमता होती है, इसलिए विपरीत परिस्थितियों में समस्याएं आना स्वाभाविक है। साथ ही यह भी बताया गया कि विभाग के कर्मचारी कठिन हालात में भी लगातार काम करते हैं, तभी लोगों तक बिजली पहुंच पाती है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर जनता हर महीने भारी-भरकम बिजली बिल, ड्यूटी चार्ज और टैक्स आखिर किस बात के लिए भरती है?
आम उपभोक्ता 8 से 10 रुपये प्रति यूनिट बिजली खरीदता है। इसके ऊपर दर्जनों तरह के चार्ज और टैक्स अलग से वसूले जाते हैं। जनता अरबों रुपये इसलिए नहीं देती कि गर्मी में घंटों अंधेरे और उमस में तड़पती रहे। लोग इसलिए भुगतान करते हैं ताकि विपरीत मौसम में भी उनका परिवार कम से कम चैन की सांस ले सके। लेकिन चांपा में हालात ऐसे हैं कि हल्की हवा चल जाए या बूंदाबांदी हो जाए, बिजली गायब होना तय माना जाता है।
सबसे बड़ा सवाल विभाग के उस “मेंटेनेंस मॉडल” पर उठ रहा है, जिसका ढिंढोरा हर साल पीटा जाता है। बारिश पूर्व मेंटेनेंस के नाम पर रोज घंटों बिजली काटी जाती है। जनता को बताया जाता है कि लाइन सुधार, पेड़ कटाई और तकनीकी मजबूती का काम हो रहा है ताकि बारिश में परेशानी न हो। लेकिन हकीकत यह है कि पहली बारिश आते ही पूरा सिस्टम चरमराने लगता है। यहां तक कि हल्की हवा भी बिजली व्यवस्था को ठप कर देती है। ऐसे में लोग पूछ रहे हैं कि आखिर यह मेंटेनेंस होता कहां है? और अगर हर साल वही हाल होना है, तो फिर जनता को बार-बार परेशान करने का औचित्य क्या है?
लोगों का गुस्सा इस बात को लेकर भी है कि विभाग अपनी विफलताओं पर आत्ममंथन करने के बजाय सोशल मीडिया में भावनात्मक पोस्ट डालकर “इंसानियत” और “देशभक्ति” का पाठ पढ़ा रहा है। उपभोक्ताओं का कहना है कि जब जनता अपना हक मांगती है, तो उसे संवेदनहीन या आक्रोशित बताकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। सवाल पूछने वालों को यह समझाने का प्रयास किया जाता है कि वे विभागीय कर्मचारियों की मेहनत नहीं समझते। जबकि असली समस्या वर्षों से जस की तस बनी हुई है।
चांपा शहर में बिजली संकट कोई नई बात नहीं है। पिछले 3-4 वर्षों से लोग लगातार कटौती, लो-वोल्टेज और तकनीकी खराबियों से जूझ रहे हैं। लेकिन न तो कोई जनप्रतिनिधि इस समस्या का स्थायी समाधान निकाल सका और न ही विभागीय अधिकारी। हां, सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफॉर्म पर बयानबाजी जरूर खूब होती है। नेता पत्र लिखते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, प्रेस नोट जारी करते हैं और फिर वाहवाही लूट लेते हैं। लेकिन जमीन पर हालात आज भी वैसे ही हैं जैसे वर्षों पहले थे। यहां तक विद्युत कार्यालय में फोन करने पर कोई भी फोन उठाने की जहमत नहीं उठाते।
अब जनता का धैर्य जवाब देने लगा है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक “मेंटेनेंस”, “तकनीकी खराबी” और “मानवता” के नाम पर उन्हें अंधेरे में रखा जाएगा? क्योंकि जनता को भाषण नहीं, बिजली चाहिए। और जब 45 डिग्री की आग उगलती गर्मी में बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों का हाल बेहाल हो, तब देशभक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि लोगों को मूलभूत सुविधा समय पर मिले।