
हरि अग्रवाल@बेबाक टिप्पणी
एक साल तक सोना मत खरीदों, पेट्रोल और डीजल की खपत कम करों, खाने में तेल का उपयोग कम करों, विदेशी ब्रांड वाले सामानों का उपयोग कम करों और स्वदेशी अपनाओ,, ये अपील देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता से की है। क्योंकि इस समय भारत एक गहरे आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। मार्च और अप्रैल के महीनों में जब पूरी दुनिया में भारी आर्थिक तबाही और मंदी की चर्चा हो रही थी, तब मोदी सरकार ने देशवासियों को इस संकट की भनक तक नहीं लगने दी। ऐसा प्रतीत होता है कि चुनाव संपन्न होने तक आर्थिक वास्तविकताओं को जनता की नजरों से दूर रखा गया। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हुए, सरकार के रुख में अचानक बदलाव आया और लोगों से अपनी खपत कम करने और डॉलर खर्च करने से बचने की अपील की जा रही है। यह अचानक किया गया बदलाव सरकार की पारदर्शिता और उसके आर्थिक प्रबंधन पर बड़े सवाल खड़े करता है।
किसी भी बड़े राष्ट्रीय या वैश्विक संकट के समय में, देश के नेता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सीधे जनता से संवाद करे और उन्हें स्थिति की गंभीरता तथा सरकार की योजनाओं के बारे में आश्वस्त करे। हालांकि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता को संबोधित जरूर किया था, लेकिन इस वैश्विक संकट से जनता को रूबरू कराने के बजाय उस नारी वंदन अधिनियम के लिए विपक्ष को कोस रहे थे, जो 2023 में पारित हो चुका था। वहीं दूसरी ओर, इस आर्थिक संकट के दौरान ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने राष्ट्र को दो-दो बार संबोधित किया और वैश्विक संकट के संबंध में जानकारी देते हुए अपनी कार्ययोजना भी जनता से साझा की। संवाद की यह कमी और संकट के समय राजनीतिक रैलियों को प्राथमिकता देना व्यापक आलोचना का केंद्र बन गया है।
भारतीय संस्कृति में सोने का विशेष महत्व है, खासकर शादियों और धनतेरस जैसे त्योहारों के अवसर पर। प्रधानमंत्री द्वारा जनता से सोना न खरीदने या इसकी खपत कम करने की अपील की गई है, जिस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस अपील की व्यापक चर्चा हो रही है। सोशल मीडिया में लोग कह रहे हैं कि क्या अब लोग शादी और धनतेरस के शुभ अवसरों पर भी सोना नहीं खरीदेंगे?। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रधानमंत्री की इस अपील से आभूषण और स्वर्ण उद्योग से जुड़े लगभग एक करोड़ लोगों की नौकरियों पर सीधा खतरा पैदा हो गया है। इस तरह की अपीलों से भारी संख्या में बेरोजगारी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है और यह चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर प्रधानमंत्री क्यों चाहते हैं कि लोग सोना खरीदना बंद कर दें। उनके लिए प्रधानमंत्री ने एक भी शब्द कहना मुनासिब नहीं समझा।
आम जनता पर एक और बड़ा प्रहार पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों के रूप में हो रहा है। सूत्रों के हवाले से यह खबरें सामने आ रही हैं कि देश में ईंधन की कीमतें फिर से बढ़ने वाली हैं। इस स्थिति में एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है जिसे कई विश्लेषकों ने उजागर किया है। वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि एक तरफ प्रधानमंत्री देश की जनता को तेल बचाने का ज्ञान दे रहे हैं, और दूसरी तरफ वे स्वयं अपना रोड शो करने के लिए निकल जाते हैं। नेताओं के पीछे बेवजह दर्जनों गाडियों का काफिला चलता है। जहां देश को बचत का उपदेश दिया जा रहा है लेकिन प्रधानमंत्री के रोड शो बदस्तूर जारी हैं। इसके अलावा मीडिया, विशेषकर गोदी मीडिया और भाजपा की जुगलबंदी पर भी सवाल उठ रहे हैं कि वे कैसे इन बुनियादी और ज्वलंत मुद्दों को नजरअंदाज कर रहे हैं।
देश में इकोनॉमिक लॉकडाउन (आर्थिक तालाबंदी) जैसी गंभीर स्थितियों पर बहस छिड़ गई है। पीएम मोदी द्वारा की गई 7 अपीलों का विश्लेषण किया जा रहा है और इसकी तुलना प्रमुख विपक्षी नेता राहुल गांधी के रुख से की जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत का यह आर्थिक संकट बहुत गहरा है और इसके लिए स्पष्ट एवं ठोस नीतियों की आवश्यकता है। स्वतंत्र मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मध्यम वर्ग के सपनों के टूटने और भारत के लिए आने वाले समय में अधिक दर्द की चेतावनियां दी जा रही हैं, जो दर्शाती हैं कि यह संकट कितना व्यापक रूप ले चुका है।
देश की अर्थव्यवस्था बेहद चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। चुनाव से पहले संकट को छुपाना, चुनाव के बाद जनता पर खपत कम करने का दबाव डालना, सोने की खरीद रोकने की अपील से करोड़ों नौकरियों को खतरे में डालना, और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच जनता को तेल बचाने का ज्ञान देकर खुद रोड शो करना ये सभी घटनाएं सरकार की कथनी और करनी में बड़े अंतर को दर्शाती हैं। देश को इस समय राजनीतिक रैलियों से ज्यादा, एक पारदर्शी और ठोस आर्थिक प्रबंधन की आवश्यकता है।