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आज का युवा सिर्फ वोटर नहीं… 2029 का हो सकता है किंगमेकर!

हरि अग्रवाल@त्वरित टिप्पणी

भारत के इतिहास में 6 जून और दिल्ली के जंतर मंतर में उमड़ी कॉकरोच जनता पार्टी की शक्ल में GenZ की भीड़ से क्या देश की राजनीतिक परिदृश्य बदलने का संकेत मिल रहा है। जिस तरह सीजेपी फाउंडर अभिजीत दिपके के आह्वान पर हजारों की संख्या में इकट्ठी हुई भीड़ की मांग भले ही अभी अधूरी है, लेकिन कहीं न कहीं ये अधूरापन किसी बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। क्योंकि राजनीति में अक्सर यह माना जाता है कि जो सबसे शांत दिखता है, वही भविष्य का सबसे बड़ा तूफान लेकर आता है।

आज भारतीय राजनीति में एक ऐसा ही बदलाव बहुत खामोशी से आकार ले रहा है, और सत्ता के गलियारों के लिए असली चुनौती अब पारंपरिक विपक्ष नहीं, बल्कि देश का वह युवा वर्ग बन रहा है, जिसके हाथ में मोबाइल है और जो हर वादे का हिसाब रखना जानता है। चुनावी राजनीति के कई उतार-चढ़ाव देखने के बाद यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि 2029 का लोकसभा चुनाव एक अभूतपूर्व जनसांख्यिकीय बदलाव का गवाह बनने जा रहा है।

आज की GenZ वह पीढ़ी है जो हर चीज का स्क्रीनशॉट रखती है और नेताओं के पांच साल पुराने बयानों को भी ढूंढकर सामने रख देती है। पहले यह माना जाता था कि युवा पीढ़ी राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेती, लेकिन आज यही पीढ़ी मीम्स बना रही है, बहस कर रही है और खुलकर अपनी नाराजगी जता रही है। राजनीति के जानकारों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखने वाले ये मीम्स केवल मजाक नहीं हैं; मीम तब बनता है जब लोगों के अंदर कोई न कोई हताशा पहले से जमा हो।

आज का युवा सिर्फ वोटर नहीं… 2029 का हो सकता है किंगमेकर! चौथा स्तंभ || Kshititech


भाषणों से मेरी लाइफ में क्या बदला?

युवाओं के बीच इस हताशा की जड़ें बहुत गहरी और वास्तविक हैं। आज उनके बीच जो बातें सबसे ज्यादा हो रही हैं, वे हैं बेरोजगारी, लचर एग्जाम सिस्टम, आए दिन होने वाले पेपर लीक, बढ़ती महंगाई और भविष्य को लेकर अनिश्चितता। बचपन से जिस बच्चे को यह कहकर बड़ा किया गया कि पढ़ लो तो सब सेट हो जाएगा, वह आज जब नौकरी के बाजार में उतरता है तो उसे खतरनाक कंपटीशन और रद्द होते एग्जाम्स का सामना करना पड़ता है। यह वह पीढ़ी है जिसने अपना पूरा जीवन लगभग एक ही राजनीतिक दौर में बिताया है, इसलिए उनके राजनीतिक फैसले नेताओं के भाषणों या टीवी विज्ञापनों से नहीं, बल्कि उनके रोजमर्रा के अनुभवों से तय होते हैं। वोटिंग बूथ के अंदर कोई टीवी डिबेट नहीं चलती, वहां सिर्फ वोटर और उसकी जिंदगी की जद्दोजहद खड़ी होती है। युवा अब सीधे पूछता है कि भाषणों से मेरी लाइफ में क्या बदला?।

2029 का निर्दयी गणित
2029 तक भारत का वोटर बेस पहले से कहीं ज्यादा युवा हो जाएगा। अनुमान बताते हैं कि 35 साल से कम उम्र के मतदाता कुल वोटरों का लगभग 45 से 50 प्रतिशत (अगर हम बीच का आंकड़ा 48 प्रतिषत मानें) हिस्सा हो सकते हैं। यानी अगले आम चुनावों में युवा वोटरों की भूमिका सिर्फ एक वर्ग की नहीं, बल्कि मुख्य खिलाड़ी की होगी और यह चुनाव का सबसे बड़ा बैटलग्राउंड बनेगा। 2014 में जो बच्चे स्कूल में थे, वे 2029 तक नौकरियां ढूंढ रहे होंगे, और उन्हें कोविड का दौर, पेपर लीक की खबरें और किराए के घरों की आसमान छूती कीमतें सब याद रहेंगी।

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वोट शेयरों का निर्दयी गणित
अगर भावनाओं को किनारे रखकर हम केवल आंकड़ों और गणितीय सिमुलेषन की बात करें तो स्थिति किसी भी राजनीतिक दल के रणनीतिकारों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। 2024 के चुनावों में बीजेपी का राष्ट्रीय वोट षेयर लगभी 35.56 प्रतिषत था। अगर हम इस 35.56 प्रतिषत को दो हिस्सों में बांटे तो युवा वोटर (लगभग 17.55 फीसदी हिस्सेदारी) और बाकी उम्रदराज वोटर (लगभग 19.01 फीसदी हिस्सेदारी)
यह मानते हुए कि उम्रदराज वोटरों का नजरिया बिल्कुल नहीं बदलता (न महंगाई का असर, न एंटी-इनकंबेंसी), और सिर्फ युवा वोटरों में से आधा (50 %) समर्थन छिटक जाता है, तो क्या होगा? सत्ताधारी दल का युवा वोट शेयर 17.5%से घटकर 8.78 % रह जाएगा, और कुल वोट शेयर 36.56 % से लुढ़क कर लगभग 27.8 % पर आ गिरेगा। भारतीय चुनाव प्रणाली में सीटों का फैसला वोट प्रतिशत से नहीं, बल्कि अलग-अलग सीटों के मुकाबलों से होता है, जहां जीत-हार का अंतर 2%, 3% या 5% ही होता है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर 8.8% अंकों की यह गिरावट दर्जनों सीटों के नतीजे पलट सकती है। यह गिरावट पार्टी को 2014 के 31.3% के ऐतिहासिक प्रदर्शन से भी बहुत नीचे धकेल सकती है।

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अगर युवा असंतोष और गहरा होता है तो यह गणित और भी भयानक रूप ले सकता है
60% युवा समर्थन खोने पर वोट शेयर लगभग 26% तक आ सकता है।
70% युवा समर्थन खोने पररू वोट शेयर 24.3% के आसपास पहुंच सकता है।
75% युवा समर्थन खोने पररू वोट शेयर गिरकर 23.4% तक आ सकता है।

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यह 23-27% का दायरा वह स्तर है जहां ष्पार्टी दफ्तरों में चाय की खपत बढ़ जाती है. सुरक्षित मानी जाने वाली सीटें भी पूरी तरह हाथ से निकल सकती हैं, क्योंकि सीटों का खेल बहुत निर्दयी होता है।

भविष्यवाणी नहीं, एक गंभीर चेतावनी
यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि यह कोई पत्थर की लकीर या भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि एक गणितीय मॉडल और संभावना है जो भविष्य के जोखिम को दर्शाती है। यह सिमुलेशन हर उस राजनीतिक दल के लिए एक चेतावनी है जो युवाओं को हल्के में लेने की भूल कर सकता है।
आज की राजनीति में सबसे बड़ा युद्ध सत्ता और विपक्ष के बीच नहीं, बल्कि उम्मीदों और हकीकत के बीच लड़ा जा रहा है। आज का युवा धार्मिक बहसों में अपना करियर नहीं ढूंढ रहा; उसे एक अच्छी सैलरी वाली नौकरी चाहिए, ऐसा घर चाहिए जिसकी ईएमआई से हार्ट अटैक ना आए, और एक पारदर्शी एग्जाम सिस्टम चाहिए जहां परीक्षा से पहले टेलीग्राम चौनलों पर पेपर न घूमता हो।

राजनीति बिल्कुल मोबाइल की बैटरी की तरह होती है; जब तक सब ठीक चल रहा होता है, कोई ध्यान नहीं देता, लेकिन बैटरी 5% पर आते ही सबको चिंता होने लगती है। आज युवा पीढ़ी ठीक इसी तरह के सवाल पूछ रही है। किसी भी सरकार की असली ताकत सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी का भरोसा जीतना होती है। इतिहास गवाह है कि जब किसी पीढ़ी को लगने लगता है कि उसे पीछे छोड़ दिया गया है, तो राजनीति को बदलने में देर नहीं लगती।

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2029 में कौन जीतेगा या हारेगा, यह समय बताएगा, लेकिन एक बात तय है कि भारत की राजनीति का भविष्य उस पीढ़ी के हाथ में होगा जो आज नौकरी ढूंढ रही है और अपने भविष्य के लिए सवाल पूछ रही है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि भविष्य के चुनाव टीवी डिबेट्स जीतने से नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा और अवसरों पर ठोस काम करने से जीते जाएंगे। जिस पीढ़ी को आज सिर्फ वोटर समझा जा रहा है, कल वही पूरे चुनाव का नतीजा तय करेगी।

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