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महंगाई की सुनामी दे रही दस्तक, देश की अर्थव्यवस्था हेडलाइंस या खोखले दावों से नहीं हो सकता मैनेज!

हरि अग्रवाल@बेबाक टिप्पणी

धर्म, जाति, आरक्षण के भंवरलाल में फंसकर लोग गौरवान्वित हैं और देश के असल मुद्दे से भटक गए है, जबकि देश में महंगाई की आग इस कदर भड़क कर अब लोगों को झुलसाने लगी है कि, पूरा देश गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। जहां एक तरफ महंगाई 42 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय रुपया ऐतिहासिक गिरावट का सामना कर रहा है। मसलन, रोजमर्रा के चीजों के भाव आसमान छूने लगे हैं और जिस तरह के हालात है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि महंगाई की सुनामी दस्तक दे रही है।

12 वर्षों के एकछत्र नेतृत्व के बाद भी, अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक खामियों को स्वीकार करने और सुधारने के बजाय, सरकार द्वारा सत्ता का महज ड्रामा रचा जा रहा है। जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से भटकाने के लिए धर्म, दिखावे और खोखले दावों की राजनीति का सहारा लिया जा रहा है। इधर, विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये की स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी है। सितंबर 2024 से ही भारत का रुपया दक्षिण एशिया और पूरी दुनिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया था। फरवरी 2025 में 1 डॉलर का भाव 87.58 रुपये था, जो 14 मई 2026 तक 95.85 रुपये तक पहुँच गया और अब इसके 96 रुपये के पार जाने की बात होने लगी है।

हैरानी की बात यह है कि जब डॉलर 90..21 रुपये पर था, तब भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार अनंत नागेश्वरन ने कहा था कि वे इसे लेकर अपनी नींद नहीं खोना चाहते। इसी तरह, जब 30 मार्च को पहली बार रुपया 95 के पार गया, तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अति आत्मविश्वास से दावा किया कि इकॉनमी के सारे फंडामेंटल्स मजबूत हैं और रुपया बिल्कुल ठीक चल रहा है। सरकार रुपये के इस ऐतिहासिक पतन का सारा दोष हालिया वैश्विक युद्ध पर मढ़ रही है, जबकि तथ्य यह है कि रुपये में गिरावट युद्ध शुरू होने से दो-ढाई साल पहले ही शुरू हो गई थी। आज़ादी के समय 1 रुपये की कीमत 1 डॉलर के बराबर थी और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के अंत तक यह 44 रुपये तक पहुँचा था, लेकिन आज यह 95 के पार लुढ़क चुका है।

महंगाई के मोर्चे पर हालात बेकाबू हो चुके हैं और इसका सीधा असर आम जनता की थाली पर पड़ रहा है। मार्च महीने में थोक मूल्य महंगाई दर (WPI) 3.88 % थी, जो अप्रैल में भयंकर उछाल के साथ 8.30 % हो गई। यह पिछले साढ़े तीन साल (42 महीने) का उच्चतम स्तर है। खुदरा महंगाई भी 14 महीनों के सर्वाेच्च स्तर पर है, जबकि अप्रैल महीने में केवल बिजली और ईंधन की महंगाई दर में 24.71% की खौफनाक वृद्धि दर्ज की गई है।

इसी तरह सोने की कीमतों ने भी आम आदमी की कमर तोड़ दी है। 14 मई को 10 ग्राम सोने का भाव 1,62,000 रुपये हो गया। ऐसे में प्रधानमंत्री देश की जनता से विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सोना न खरीदने की अपील कर रहे हैं। यह अपील उन गरीब और मध्यम वर्गीय लोगों से की जा रही है जो कमर्शियल गैस सिलेंडर 3000 रुपये का होने पर अपनी दुकानें बंद कर चुके हैं या सब्जी का हिसाब भी डायरी में लिखते हैं। उन रसूखदार लोगों पर कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा जो एक ही बार में 20 से 50 लाख रुपये का सोना थोक में खरीद रहे हैं।

देश की जनता को धर्म के नाम पर गर्व करने में उलझा दिया गया है। पिछले 50 साल में आज बेरोजगारी सबसे अधिक है। फिर भी, जो लोग भारत में धर्म के नाम पर गर्व कर रहे हैं, वे उच्च शिक्षा की बदहाली के कारण अपने बच्चों को डॉलर देकर विदेशों में पढ़ने भेज रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था केवल बाहरी कारणों से नहीं, बल्कि आंतरिक नीतियों की विफलता से चरमराई है। 27 फरवरी को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728.5 बिलियन डॉलर था, जो 1 मई को घटकर 690.7 बिलियन डॉलर रह गया। रुपये को गिरने से बचाने के लिए रिजर्व बैंक (RBI) को लगातार अपना फॉरेक्स (डॉलर) बेचना पड़ रहा है; 23 मार्च के आसपास ही RBI ने 4 अरब डॉलर बेचे थे।

वहीं दूसरी ओर, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारत के बाजार से लगातार अपना पैसा निकाल रहे हैं। 2025 में उन्होंने 19.7 बिलियन डॉलर (करीब 1.80 लाख करोड़ रुपये) निकाले और 2025 से अब तक कुल 3.6 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं। भारत के ग्लोबल मार्केट कैप का हिस्सा 4.73 फीसदी के शीर्ष से गिरकर 3 प्रतिशत से नीचे आ गया है। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के अनुसार, 2025 में भारत का शेयर बाजार दुनिया के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले बाजारों में रहा।

भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत तेल, लगभग सारा सोना, प्राकृतिक गैस, खाने वाले तेल और फर्टिलाइजर आयात करता है। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। पिछले 12 सालों में मेक इन इंडिया बुरी तरह फेल हुआ है और देश में निर्यात लायक उच्च गुणवत्ता का उत्पादन नहीं बढ़ सका। अपनी आर्थिक विफलताओं से जनता का ध्यान भटकाने के लिए गोदी मीडिया का सहारा लेना किसी से छिपी नहीं है।

इधर, 2017 में वीआईपी संस्कृति खत्म करने के नाम पर लाल बत्ती हटाई गई थी। अब जो वीआईपी नेता 10-50 कारों के काफिले में चलते थे, वे 10 कारों की जगह 2 कारों से चलने का त्याग दिखा रहे हैं, जिसे मीडिया द्वारा देश के लिए महान कदम बताया जा रहा है। लोग अब सवाल करने लगे हैं कि प्रधानमंत्री आम जनता से वर्क फ्रॉम होम करने और विदेश यात्राओं पर न जाने की अपील कर रहे हैं। लेकिन 2021 से 2025 के बीच खुद प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर 460 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए हैं, जिनका कोई ठोस नतीजा क्या सामने आया, अब भी रहस्य बना हुआ है।

खबरों के मुताबिक, अमेरिका के राजदूत भारत के राज्यों में जा रहे हैं, लेकिन उसी अमेरिका के दबाव में भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता कर रहा है। भारत ने अप्रैल में रूस से सस्ते एलएनजी (LNG) और फर्टिलाइजर से लदे टैंकरों को अमेरिका के डर से लौटा दिया। आंकड़े और तथ्य चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि देश के सामने एक भयंकर आर्थिक तूफान खड़ा है। 12 वर्षों की आर्थिक नीतियों की विफलता, बिना तैयारी के लागू की गई नोटबंदी और गलत जीएसटी ने छोटे उद्योगों की कमर तोड़ दी है। चुनाव जीतने के लिए धर्म की राजनीति काम आ सकती है, लेकिन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को हेडलाइंस या खोखले दावों से मैनेज नहीं किया जा सकता। यदि रुपये के ऐतिहासिक पतन, बेलगाम महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी की इस सच्चाई को तुरंत स्वीकार कर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भारत का आम आदमी इस आर्थिक तबाही के बोझ तले पूरी तरह से दब जाएगा।

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