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महिला आरक्षण के बहाने क्या बदलने जा रहा है देश का राजनीतिक नक्शा?

हरि अग्रवाल@बेबाक टिप्पणी

देश की राजनीति इस समय एक ऐसे संवेदनशील मोड़ पर खड़ी है, जहां फैसलों से ज्यादा उनकी नीयत, समय और प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। एक बार फिर केंद्र की सत्ता बड़े फैसले की तैयारी में दिख रही है, और इस बार मुद्दा है महिला आरक्षण और परिसीमन।

लेकिन क्या यह सिर्फ महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया कदम है? या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक रणनीति काम कर रही है? अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो एक पैटर्न साफ नजर आता है। नोटबंदी, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, एक रात में लिया गया फैसला, जिसने पूरे देश को प्रभावित किया। लाखों लोग बैंकों की कतारों में लगे, आर्थिक गतिविधियां ठप हुईं, और आज भी उस फैसले के वास्तविक लाभ और नुकसान पर बहस जारी है।

अब एक बार फिर वैसा ही माहौल बनता दिख रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मुद्दा सीधे देश के लोकतांत्रिक ढांचे से जुड़ा है। साल 2023 में संसद ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को सर्वसम्मति से पारित किया। यह एक ऐतिहासिक कदम था, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। हर दल ने इसका समर्थन किया।

देश की महिलाओं ने इसे अपने अधिकार की दिशा में बड़ा कदम माना। लेकिन, इसे तुरंत लागू नहीं किया गया। इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया। यानी, पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन, और उसके बाद ही आरक्षण लागू होगा। यहीं से सवाल खड़े होने शुरू होते हैं।

परिसीमन का मतलब है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं और संख्या को तय करना। भारत में हर क्षेत्र की आबादी अलग-अलग गति से बढ़ती है। इसलिए समय-समय पर सीटों का पुनर्वितरण जरूरी होता है, ताकि प्रतिनिधित्व संतुलित बना रहे। लेकिन, इसके लिए सबसे जरूरी है ताज़ा जनगणना डेटा। बिना जनगणना के परिसीमन करना संवैधानिक और व्यावहारिक रूप से संदिग्ध माना जाता है। और यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है। जब 2021 की जनगणना अब तक नहीं हुई, तो परिसीमन कैसे होगा?

इधर, विपक्ष का आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण को एक भावनात्मक मुद्दा बनाकर परिसीमन के असली एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहती है। उनका तर्क है कि महिला आरक्षण और परिसीमन का सीधा संबंध नहीं है। 543 लोकसभा सीटों में से 33 फीसदी सीटें अभी भी आरक्षित की जा सकती है तो फिर सवाल तुरंत आरक्षण लागू करने से रोक कौन रहा है? कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और विपक्ष को भरोसे में नहीं लिया गया। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने साफ कहा “जब प्रस्ताव की जानकारी ही नहीं है, तो चर्चा कैसे होगी?”

इस पूरे घटनाक्रम का समय भी कई सवाल खड़े करता है। देश के कई राज्यों में चुनावी माहौल है और इसी बीच अचानक विशेष सत्र बुलाने की बात सामने आती है। विपक्ष का आरोप है कि यह जल्दबाज़ी राजनीतिक लाभ के लिए की जा रही है।  अगर यह इतना ही जरूरी था, तो चुनाव खत्म होने के बाद सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुलाई गई?

भारत के लोकतंत्र में बड़े फैसले हमेशा व्यापक चर्चा के बाद लिए गए हैं। 73वां और 74वां संविधान संशोधन इसका उदाहरण हैं। इन पर लगभग 5 साल तक चर्चा हुई, तब जाकर महिलाओं को स्थानीय निकायों में 40 प्रतिशत तक प्रतिनिधित्व मिला। आज वही पारदर्शिता और संवाद कहीं गायब नजर आता है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रहा, बल्कि सभी चाहते हैं कि यह जल्द से जल्द लागू हो लेकिन क्या इसे एक राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है? क्या परिसीमन के जरिए चुनावी समीकरण बदले जाएंगे? क्योंकि परिसीमन सिर्फ सीटों का बंटवारा नहीं होता। यह राजनीतिक ताकत का पुनर्वितरण भी होता है।

आज देश एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। जहाँ एक तरफ महिलाओं के अधिकारों की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। लोकतंत्र में फैसले थोपे नहीं जाते। उन्हें चर्चा, सहमति और विश्वास के साथ लागू किया जाता है। देश जानना चाहता है क्या यह कदम वास्तव में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए है? या फिर यह एक बड़े राजनीतिक बदलाव की तैयारी है? “जब फैसले जल्दबाज़ी में लिए जाते हैं, तो सवाल लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़ते। अब देखना यह है क्या सरकार इन सवालों का जवाब देती है, या फिर इतिहास एक और बहस को जन्म देता है।

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