निजता की सुरक्षा के नाम पर पत्रकारिता और RTI पर संकट? DPDP एक्ट को लेकर देश में छिड़ी कानूनी बहस

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा डिजिटल मीडिया संगठनों का मामला, DNPA ने कानून के प्रावधानों को दी चुनौती; 17 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
नई दिल्ली। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम 2023 (DPDP Act) को लेकर देश में पत्रकारिता की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार (RTI) पर संभावित प्रभाव को लेकर बहस तेज हो गई है। नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी और निजता की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाए गए इस कानून के कुछ प्रावधानों को मीडिया संगठनों ने चुनौती दी है। उनका कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी पत्रकारिता, सरकारी सूचनाओं तक पहुंच और भ्रष्टाचार उजागर करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इस पूरे विवाद के केंद्र में DPDP एक्ट की धारा 44(3) है, जिसके माध्यम से सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 8(1)(j) में संशोधन किया गया है। इस संशोधन के बाद व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचना को सार्वजनिक करने से छूट देने वाले प्रावधान का स्वरूप बदल गया है। पुराने प्रावधान में व्यक्तिगत जानकारी, सार्वजनिक गतिविधि, निजता में अनावश्यक हस्तक्षेप और व्यापक सार्वजनिक हित के बीच संतुलन से जुड़ी स्पष्ट व्यवस्था थी। नए प्रावधान में इसे बदलकर केवल व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचना को छूट के दायरे में रखा गया है।
RTI कानून में बदलाव से बढ़ी चिंता
RTI कानून की धारा 8(1)(j) में हुए बदलाव को लेकर सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की चिंता है कि सरकारी विभाग व्यक्तिगत जानकारी का हवाला देकर ऐसी सूचनाएं भी रोक सकते हैं, जिनका सीधा संबंध सार्वजनिक हित और प्रशासनिक जवाबदेही से है। मसलन, किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई, सरकारी योजनाओं में अनियमितता, सार्वजनिक धन के इस्तेमाल, नियुक्तियों और सरकारी खरीद से जुड़े दस्तावेजों में अधिकारियों या अन्य व्यक्तियों की जानकारी भी शामिल हो सकती है। ऐसे मामलों में यह सवाल उठता है कि क्या व्यक्तिगत जानकारी का आधार बनाकर पूरे दस्तावेज को गोपनीय किया जा सकता है? विशेषज्ञों के अनुसार, निजता की सुरक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना जरूरी है। किसी व्यक्ति की निजी और पारिवारिक जानकारी की सुरक्षा होनी चाहिए, लेकिन सरकारी पद पर रहते हुए किए गए कार्यों और सार्वजनिक धन से जुड़े निर्णयों की जांच का रास्ता भी खुला रहना चाहिए।
पत्रकारिता के लिए विशेष छूट नहीं होने पर सवाल
DPDP एक्ट को लेकर मीडिया संगठनों की प्रमुख आपत्ति यह है कि पत्रकारिता और जनहित में की जाने वाली खोजी रिपोर्टिंग के लिए स्पष्ट एवं व्यापक छूट की व्यवस्था नहीं की गई है। खोजी पत्रकारिता में पत्रकारों को कई बार सरकारी दस्तावेजों, विभागीय रिकॉर्ड, डिजिटल डेटा और अन्य स्रोतों से जानकारी जुटानी पड़ती है। इन जानकारियों के आधार पर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही, सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी और सार्वजनिक पदों के दुरुपयोग जैसे मामले सामने आते हैं। मीडिया संगठनों का तर्क है कि यदि समाचार प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति जैसी शर्तें लागू होने लगें या व्यक्तिगत डेटा से जुड़े प्रावधानों के कारण रिपोर्टिंग पर कानूनी दबाव बढ़े, तो पत्रकारिता की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, इस संबंध में कानून की वास्तविक व्याख्या और उसके लागू होने का प्रभाव न्यायिक समीक्षा का विषय है।
DNPA ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
DPDP एक्ट को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने कानून और उससे जुड़े नियमों के कई प्रावधानों को चुनौती देते हुए याचिका दायर की है। 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने DNPA की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं।DNPA की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत में दलील दी कि पत्रकारिता के लिए विशेष छूट नहीं होने से समाचार संकलन, खोजी रिपोर्टिंग और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। एसोसिएशन ने कानून के कुछ प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग भी की है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की निजता और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत ने केंद्र सरकार का पक्ष सुने बिना फिलहाल अंतरिम राहत देने से इनकार किया है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
क्या सरकारी कामकाज की जानकारी भी हो सकती है प्रभावित?
इस कानून को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे अधिकारियों और सरकारी संस्थाओं के कामकाज से जुड़ी जानकारी किस सीमा तक सार्वजनिक रहेगी। उदाहरण के तौर पर किसी जिले के सरकारी अस्पताल में चिकित्सकों की नियुक्ति, उनकी ड्यूटी, सरकारी बजट का उपयोग, दवाओं की खरीद, निर्माण कार्यों का भुगतान और विभागीय जांच से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक जवाबदेही के महत्वपूर्ण विषय हैं। यदि इन दस्तावेजों में किसी व्यक्ति का नाम, हस्ताक्षर या अन्य व्यक्तिगत विवरण मौजूद है, तो क्या पूरे दस्तावेज को व्यक्तिगत जानकारी बताकर रोका जा सकता है? यह प्रश्न आने वाले समय में RTI व्यवस्था के सामने महत्वपूर्ण चुनौती बन सकता है। हालांकि, RTI अधिनियम की धारा 8(2) में व्यापक सार्वजनिक हित के आधार पर सूचना के खुलासे का प्रावधान अब भी मौजूद है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि सार्वजनिक हित में सूचना मिलने का अधिकार पूरी तरह समाप्त हो गया है।
सरकार का पक्ष भी महत्वपूर्ण
केंद्र सरकार की ओर से डेटा संरक्षण कानून का उद्देश्य नागरिकों की डिजिटल निजता और व्यक्तिगत जानकारी को सुरक्षित करना बताया गया है। आज बैंकिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा, सरकारी योजनाओं और डिजिटल सेवाओं में नागरिकों की निजी जानकारी का व्यापक इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में उसकी सुरक्षा के लिए कानूनी व्यवस्था जरूरी है। निजता का अधिकार भी संविधान के तहत मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2017 में के.एस. पुट्टस्वामी मामले में इसे मान्यता दी थी। इसलिए किसी व्यक्ति की निजी जानकारी को बिना उचित आधार सार्वजनिक करना भी अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। लेकिन निजता की सुरक्षा और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाए रखना ही इस कानून की सबसे बड़ी कसौटी होगी।
13 नवंबर 2025 से प्रभावी हुआ RTI संशोधन
केंद्र सरकार की अधिसूचना के अनुसार DPDP एक्ट के प्रावधान अलग-अलग चरणों में लागू किए गए हैं। RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) में संशोधन करने वाली धारा 44(3) 13 नवंबर 2025 से प्रभावी हो चुकी है। वहीं डेटा प्रसंस्करण से संबंधित अधिकांश मुख्य प्रावधान 13 मई 2027 से प्रभावी होने निर्धारित हैं। इसका मतलब है कि RTI कानून में किया गया बदलाव पहले से लागू है, जबकि डेटा संरक्षण से जुड़े कई प्रमुख दायित्वों को लागू होने में अभी समय है।
लोकतांत्रिक पारदर्शिता और निजता के बीच संतुलन जरूरी
DPDP एक्ट को लेकर उठ रही बहस केवल पत्रकारों या मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं है। इसका संबंध आम नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार, सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही और लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता से भी है। यदि कोई सरकारी विभाग भ्रष्टाचार, सरकारी धन के दुरुपयोग या प्रशासनिक अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेजों को व्यक्तिगत जानकारी बताकर रोकता है, तो इसका असर जनहित में काम करने वाले पत्रकारों, RTI कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों पर पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर, पत्रकारिता की स्वतंत्रता के नाम पर किसी व्यक्ति की निजी जानकारी का अनावश्यक खुलासा भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के सामने चुनौती होगी कि नागरिकों की निजता की रक्षा के साथ पत्रकारिता की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार के संवैधानिक महत्व के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाए। क्योंकि लोकतंत्र में निजता की सुरक्षा जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी है सत्ता और प्रशासन से सवाल पूछने की स्वतंत्रता। कानून का उद्देश्य नागरिकों की जानकारी को सुरक्षित करना होना चाहिए, न कि जनहित से जुड़ी सूचनाओं तक पहुंच को अनावश्यक रूप से कठिन बनाना।