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शिव सहिस की कस्टडी में मौत के बाद 25 हजार रुपये का वादा, आखिर किस फंड से होगी जिंदगीभर की मदद?

जांजगीर-चांपा। चांपा थाने की कस्टडी में शिव सहिस की मौत के बाद मामला शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। एक ओर परिवार अपने बेटे को खोने के गम में डूबा है, तो दूसरी ओर घटना के बाद पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच परिजनों को आर्थिक सहायता देने के लिए किए गए कथित इकरारनामे ने पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया है।

शिव सहिस की मौत के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों का आक्रोश पुलिस के खिलाफ जमकर फूटा। हालात को संभालने और परिवार को शांत कराने के लिए पुलिस की ओर से उनकी कुछ मांगों पर सहमति बनी। इसी क्रम में 50 रुपये के स्टाम्प पेपर पर एक इकरारनामा किए जाने की बात सामने आई है, जिसमें परिवार को हर महीने 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने का उल्लेख है। खास बात यह है कि यह राशि जीवनपर्यंत दिए जाने का इकरार किए जाने की बात कही जा रही है। यही बात अब लोगों के जेहन में सबसे बड़ा सवाल बनकर उभर रही है, आखिर हर महीने 25 हजार रुपये आएंगे कहां से?

क्या पुलिस विभाग के पास ऐसा कोई वैधानिक फंड है, जिससे किसी परिवार को जीवनभर हर महीने आर्थिक सहायता दी जा सके? अगर ऐसा कोई प्रावधान है तो उसकी प्रक्रिया क्या है और भुगतान की जिम्मेदारी किसकी होगी? वहीं, यदि पुलिस विभाग के पास ऐसा कोई निर्धारित प्रावधान नहीं है, तो स्टाम्प पेपर पर किया गया यह इकरार किस आधार पर हुआ?

फिलहाल शिव सहिस की मौत के बाद सामने आया यह इकरारनामा कई सवालों के बीच है। एक तरफ परिवार का दर्द है, दूसरी तरफ 25 हजार रुपये प्रतिमाह की जिंदगीभर की मदद का वादा—अब देखना होगा कि यह वादा किस व्यवस्था के तहत पूरा होता है।

राजेश अग्रवाल ने उठाए गंभीर सवाल

कांग्रेस जिला अध्यक्ष राजेश अग्रवाल ने इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि शिव सहिस की मौत के बाद परिवार बेहद दुख और सदमे में है। ऐसे समय में उन्हें राहत देने की जरूरत है, लेकिन सवाल यह है कि पुलिस ने जिस 25 हजार रुपये प्रतिमाह देने का इकरार किया है, उसकी व्यवस्था आखिर कहां से होगी?

राजेश अग्रवाल ने कहा कि पुलिस के पास ऐसा कौन-सा फंड है, जिससे किसी परिवार को हर महीने 25 हजार रुपये जीवनभर दिए जा सकें? क्या शासन या पुलिस विभाग के नियमों में ऐसी कोई व्यवस्था है? यदि है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि लोगों को भी पता चले कि यह राशि किस मद से और किस प्रक्रिया के तहत दी जाएगी।

उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि सक्ती में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के आने का कार्यक्रम था। ऐसे में पुलिस पर स्थिति को तत्काल नियंत्रित करने का दबाव रहा होगा और इसी वजह से परिजनों की मांगों को आनन-फानन में स्वीकार कर इकरार कर दिया गया।

अग्रवाल ने कहा कि किसी दुखी परिवार को तत्काल राहत देने का निर्णय मानवीय दृष्टि से समझा जा सकता है, लेकिन सरकारी व्यवस्था में किए गए वादे केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि स्पष्ट नियम, बजट और वैधानिक प्रक्रिया के तहत पूरे होने चाहिए। यदि आज 25 हजार रुपये प्रतिमाह देने का वादा किया गया है, तो कल इसका भुगतान कौन करेगा और किस मद से करेगा, यह स्पष्ट होना जरूरी है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस इकरारनामे को पूरा करने के लिए कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं है, तो आने वाले समय में परिवार को फिर से सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। शिव सहिस को खो चुका परिवार दोबारा किसी नए संघर्ष में न फंसे, इसके लिए प्रशासन को इस वादे की कानूनी और वित्तीय स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

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