यूपी में मतदाता सूची पर उठे गंभीर सवाल: 158 नामों में सॉफ्टवेयर की चूक, पीलीभीत में 13,150 प्रविष्टियों की जांच

एमएलसी चुनाव की मतदाता सूची में ‘राम ने यादव को मारा’ जैसी प्रविष्टियों से मचा विवाद; पीलीभीत में EPIC नंबर के सामने नाम बदलने के आरोपों की जांच, निर्वाचन आयोग के सामने तकनीकी शुद्धता और प्रशासनिक जवाबदेही की चुनौती।
विशेष रिपोर्ट | चौथा स्तंभ न्यूज
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर अक्टूबर 2026 में दो अलग-अलग मामलों ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला मामला विधान परिषद की शिक्षक एवं स्नातक निर्वाचन सीटों की मतदाता सूची में असामान्य नाम दर्ज होने से जुड़ा है, जबकि दूसरा पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र में मतदाता पहचान संख्या (EPIC) के सामने अलग-अलग नाम दर्ज होने की शिकायतों से संबंधित है।
विधान परिषद चुनाव के मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने 14,81,310 प्रविष्टियों में 158 असामान्य प्रविष्टियां मिलने की जानकारी दी। अधिकारियों के अनुसार, अंग्रेजी में दर्ज नामों को हिंदी लिपि में लिखने के लिए तैयार सॉफ्टवेयर ने कुछ मामलों में नामों का लिप्यंतरण करने के बजाय उनका अर्थ अनुवाद कर दिया। दूसरी ओर, पीलीभीत में मतदाता सूची के कुछ विवरण बदलने के आरोपों के बाद निर्वाचन अधिकारियों ने जांच शुरू की है। और में इन मामलों का विवरण प्रकाशित हुआ है।
इन घटनाओं के बाद प्रमुख प्रश्न यह है कि मतदाता सूची तैयार करने वाली डिजिटल प्रणाली में त्रुटियां कैसे आईं, मानवीय सत्यापन की प्रक्रिया कहां कमजोर पड़ी और प्रभावित मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
1. एमएलसी चुनाव की मतदाता सूची में कैसे सामने आईं अजीब प्रविष्टियां?
उत्तर प्रदेश विधान परिषद की पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन सीटों के लिए वर्ष 2026 में हुए चुनाव से पहले मतदाता सूची में कुछ ऐसी प्रविष्टियां सामने आईं, जिन्होंने निर्वाचन व्यवस्था की तकनीकी प्रक्रिया पर ध्यान खींचा।
इलाहाबाद-झांसी खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में ‘राम ने यादव को मारा’ जैसी प्रविष्टि दर्ज होने की खबर सामने आई। कुछ अन्य प्रविष्टियों में भी मतदाताओं या उनके परिजनों के नाम असामान्य रूप में दर्ज पाए गए। एक मामले में पिता के नाम वाले कॉलम में ‘B.Com’ लिखे होने की भी रिपोर्ट आई। इन विवरणों की जानकारी सामने आने के बाद मामला सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया। ।
यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल गलत नाम छपने का नहीं है। मतदाता सूची में दर्ज व्यक्तिगत जानकारी नागरिक की पहचान, मतदान केंद्र और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़ी होती है। इसलिए नाम, पिता का नाम और अन्य विवरणों की शुद्धता सुनिश्चित करना चुनाव प्रबंधन का अनिवार्य हिस्सा है।
हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सभी असामान्य प्रविष्टियां जानबूझकर की गई थीं या प्रत्येक मामले में मतदान का अधिकार प्रभावित हुआ। इसके लिए अलग-अलग प्रविष्टियों और संबंधित मतदाताओं की स्थिति की जांच आवश्यक है।
2. 14,81,310 में से 158 प्रविष्टियां: आंकड़े क्या बताते हैं?
मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा के अनुसार, विधान परिषद की संबंधित मतदाता सूचियों में कुल 14,81,310 प्रविष्टियों में से 158 में असामान्य नाम दर्ज होने की बात सामने आई। कुल प्रविष्टियां 14,81,310 असामान्य प्रविष्टियां 158 कुल प्रविष्टियों में असामान्य प्रविष्टियों का अनुपात लगभग 0.0107% यह गणना 158 को 14,81,310 से भाग देकर की गई है। यह केवल असामान्य प्रविष्टियों का अनुपात है, पूरी मतदाता सूची की समग्र त्रुटि दर नहीं।
आंकड़ों से स्पष्ट है कि अधिकारियों द्वारा बताई गई असामान्य प्रविष्टियों की संख्या कुल प्रविष्टियों की तुलना में कम है। लेकिन किसी त्रुटि का महत्व केवल उसकी संख्या से तय नहीं होता। यह भी देखना आवश्यक है कि गलती किस प्रकार की थी, क्या संबंधित मतदाता की पहचान सत्यापित हो सकी और क्या उस त्रुटि के कारण किसी को मतदान में कठिनाई हुई।
इसीलिए इन आंकड़ों को न तो पूरी चुनावी व्यवस्था में व्यापक धांधली का निर्णायक प्रमाण माना जा सकता है और न ही कम प्रतिशत के आधार पर मामले को महत्वहीन बताया जा सकता है।
3. सॉफ्टवेयर की गलती: ट्रांसलिटरेशन की जगह ट्रांसलेशन
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के स्पष्टीकरण के अनुसार, विधान परिषद की मतदाता सूची तैयार करने की ऑनलाइन प्रक्रिया में पहली बार पंजीकरण की सुविधा शुरू की गई थी। अंग्रेजी में दर्ज नामों को हिंदी लिपि में बदलने के लिए सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया।
इस प्रक्रिया में दो तकनीकी शब्दों के बीच अंतर समझना जरूरी है:
- ट्रांसलिटरेशन (Transliteration): किसी शब्द या नाम को उसके उच्चारण के आधार पर दूसरी लिपि में लिखना। उदाहरण के लिए, ‘Ramhit Yadav’ को ‘रामहित यादव’ लिखना।
- ट्रांसलेशन (Translation): किसी शब्द या वाक्य का अर्थ दूसरी भाषा में बदलना।
बताए गए उदाहरण में ‘Ramhit Yadav’ को अंग्रेजी में अलग-अलग शब्दों के रूप में दर्ज किए जाने पर सॉफ्टवेयर ने ‘Ram hit Yadav’ को एक वाक्य की तरह समझ लिया और उसका हिंदी अर्थ ‘राम ने यादव को मारा’ बना दिया।
अर्थात, प्रणाली ने नाम को पहचान-संबंधी जानकारी के रूप में संभालने के बजाय उसके शब्दों का अर्थ निकाल दिया। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, सॉफ्टवेयर में संपादन और सुधार की सुविधा मौजूद थी, लेकिन कुछ त्रुटियां अंतिम सूची तक पहुंच गईं। अधिकारियों ने संबंधित स्तरों पर हुई चूक के बारे में स्पष्टीकरण भी मांगा। ।
यह स्पष्टीकरण तकनीकी गलती की संभावित वजह बताता है, लेकिन इससे गुणवत्ता नियंत्रण का प्रश्न समाप्त नहीं होता। यदि किसी सॉफ्टवेयर में नामों को स्वचालित रूप से बदलने की सुविधा है, तो उसे लागू करने से पहले अलग-अलग नामों, वर्तनी और भाषा-संबंधी स्थितियों में परीक्षण करना आवश्यक है।
साथ ही, अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले मानवीय सत्यापन और त्रुटिपूर्ण प्रविष्टियों को सुधारने की प्रक्रिया प्रभावी होनी चाहिए। इस मामले में तकनीकी चूक और मानवीय लापरवाही की सापेक्ष भूमिका जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट हो सकेगी।
4. पीलीभीत सदर: 13,150 प्रविष्टियों पर उठे सवाल
मतदाता सूची से जुड़ा दूसरा मामला पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र संख्या 127 का है। यहां विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद प्रकाशित मतदाता सूची में कुछ प्रविष्टियों को लेकर शिकायतें सामने आईं।
कांग्रेस की ओर से लगाए गए आरोपों के अनुसार, अप्रैल में प्रकाशित सूची और जुलाई से सितंबर के बीच उपलब्ध विवरणों की तुलना में 13,150 प्रविष्टियों के नाम बदलने की शिकायत की गई, जबकि संबंधित EPIC नंबर और क्रम संख्या समान रहने का दावा किया गया।
इस मामले में एक जरूरी अंतर समझना चाहिए: 13,150 का आंकड़ा शिकायत और तुलना के आधार पर उठाए गए मामलों से संबंधित है। इसे बिना जांच के 13,150 मतदाताओं की पहचान जानबूझकर बदलने या इतने मतदाताओं के वोट चोरी होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए पीलीभीत के जिला निर्वाचन अधिकारी से जांच कराने और संबंधित रिकॉर्ड की पड़ताल करने को कहा। अधिकारियों के अनुसार, अप्रैल में प्रकाशित सूची से जुड़े EPIC नंबरों के सामने दूसरे मतदाताओं का विवरण दिखाई देने की शिकायतों की जांच की जा रही है। ।
इस मामले में जांच के लिए कुछ बुनियादी सवाल महत्वपूर्ण हैं:
- क्या संबंधित EPIC नंबर के सामने वास्तव में अलग-अलग समय पर अलग नाम दर्ज हुए?
- क्या यह बदलाव वैध संशोधन, डेटा-माइग्रेशन की त्रुटि, गलत प्रविष्टि या किसी अन्य कारण से हुआ?
- क्या संबंधित मतदाताओं को बदलाव की सूचना दी गई और उन्हें अपना रिकॉर्ड सुधारने का अवसर मिला?
- क्या प्रत्येक संदिग्ध प्रविष्टि का सत्यापन मूल आवेदन, संशोधन रिकॉर्ड और संबंधित दस्तावेजों से किया गया?
इन प्रश्नों के उत्तर ही यह निर्धारित कर सकते हैं कि मामला तकनीकी त्रुटि का है, प्रशासनिक लापरवाही का या किसी अधिक गंभीर अनियमितता का।
5. प्रशासनिक जवाबदेही: अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण है?
पीलीभीत मामले में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, प्रारंभिक जांच के बाद एक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) और मतदाता पंजीकरण केंद्र (VRC) से जुड़े कंप्यूटर ऑपरेटर को हटाने की कार्रवाई की गई। साथ ही, संबंधित रिकॉर्ड की जांच और जिम्मेदारी निर्धारित करने की प्रक्रिया शुरू की गई। ।
यह कार्रवाई प्रशासनिक स्तर पर मामले को गंभीरता से लेने का संकेत है, लेकिन किसी अधिकारी को पद से हटाना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। अंतिम जिम्मेदारी निर्धारित करने के लिए जांच, संबंधित कर्मचारियों का पक्ष और उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण आवश्यक है।
निर्वाचन सूची तैयार करने की प्रक्रिया में कई स्तर शामिल होते हैं—आवेदन प्राप्त करना, दस्तावेजों का सत्यापन, रिकॉर्ड में संशोधन, डुप्लीकेट प्रविष्टियों की जांच और अंतिम सूची का प्रकाशन। यदि इन चरणों में से किसी एक पर भी नियंत्रण कमजोर हो, तो गलत जानकारी अंतिम रिकॉर्ड तक पहुंच सकती है।
इसलिए जवाबदेही केवल किसी एक कंप्यूटर ऑपरेटर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि सॉफ्टवेयर का परीक्षण किस स्तर पर हुआ, सत्यापन की जिम्मेदारी किसकी थी और त्रुटियों को अंतिम सूची में पहुंचने से रोकने के लिए कौन-से नियंत्रण मौजूद थे।
6. दो अलग मामलों को एक ही निष्कर्ष से नहीं जोड़ा जा सकता
विधान परिषद की मतदाता सूची में नामों के गलत अनुवाद का मामला और पीलीभीत में EPIC नंबर के सामने अलग नाम दर्ज होने की शिकायतें, दोनों चुनावी डेटा की विश्वसनीयता से संबंधित हैं। लेकिन दोनों की प्रकृति अलग है।
पहले मामले में अधिकारियों ने असामान्य नामों के पीछे अंग्रेजी से हिंदी में रूपांतरण की तकनीकी त्रुटि और सत्यापन में चूक की बात कही है। दूसरे मामले में EPIC नंबर और मतदाता विवरण के बीच कथित विसंगतियों की जांच की जा रही है।
इसी तरह, एक ही व्यक्ति के नाम पर कई वोटर आईडी कार्ड जारी होने की अन्य शिकायतों को भी प्रत्येक मामले के दस्तावेजों और आधिकारिक निष्कर्षों के आधार पर परखना होगा। अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर प्रदेशव्यापी धांधली का निष्कर्ष निकालने के लिए स्वतंत्र और व्यापक प्रमाण आवश्यक हैं।
हालांकि, इन घटनाओं से एक साझा प्रशासनिक सबक जरूर मिलता है: चुनावी डेटा का डिजिटलीकरण तभी भरोसेमंद बन सकता है, जब तकनीकी प्रणाली के साथ मजबूत सत्यापन, पारदर्शी सुधार प्रक्रिया और स्वतंत्र जांच की व्यवस्था भी मौजूद हो।